नई दिल्ली, 29 जनवरी । केन्द्र सरकार की संस्था राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने एक सराहनीय कदम उठाया है। मुंबई के प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल से जो कमाई हुई, उसका 17 लाख रुपये का हिस्सा बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) की जैव विविधता समिति को सौंपा गया है। यह पैसा 'एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग' (एबीएस) नियम के तहत दिया गया है, ताकि मुंबई की प्रकृति और पर्यावरण को बेहतर बनाने में इसका इस्तेमाल हो सके।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की गुरुवार को जारी विज्ञप्ति के अनुसार वैज्ञानिकों ने मिट्टी में पाए जाने वाले एक खास तरह के बैक्टीरिया (बैसिलस) का इस्तेमाल करके सेहत के लिए फायदेमंद प्रोबायोटिक उत्पाद (जैसे दही या पोषक तत्व जो पेट के लिए अच्छे होते हैं) बनाए। इन उत्पादों को बाजार में बेचने से जो पैसा (मुनाफा) मिला, उसका एक हिस्सा उन स्थानीय लोगों या समुदायों को दिया गया जहां से ये प्राकृतिक संसाधन मिले थे।
जैव प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा एबीएस निधि में दिया गया यह 10 करोड़ रुपये का योगदान दिखाता है कि सूक्ष्मजीवों का बिजनेस अब बहुत बड़ा हो गया है।
प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली कमाई (एबीएस) के मामले में महाराष्ट्र देश का दूसरा सबसे बड़ा लाभार्थी राज्य है। अगर लाल चंदन से मिलने वाले पैसे को अलग कर दिया जाए, तो महाराष्ट्र इस फंड को पाने में पूरे भारत में पहले नंबर पर आता है। महाराष्ट्र को अब तक कुल 8 करोड़ रुपये की एबीएस सहायता मिल चुकी है। इस राशि का लाभ राज्य की 200 से अधिक जैव विविधता प्रबंधन समितियों और 7 प्रमुख संस्थानों को मिला है, जिससे स्थानीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण को मजबूती मिली है।
भारत ने जैव विविधता के संसाधनों से होने वाली कमाई में 144.37 करोड़ रुपये बांटने का बड़ा लक्ष्य पार कर लिया है, जो दिखाता है कि 2002 का जैव विविधता कानून जमीनी स्तर पर सफल हो रहा है। इस पैसे का इस्तेमाल स्थानीय गांवों की समितियों को मजबूत करने और लोगों की कमाई बढ़ाने में किया जा रहा है। यह कामयाबी पूरी दुनिया में भारत को पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों के सही बंटवारे में एक नेतृत्व के रूप में स्थापित करती है।
