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राष्ट्र निर्माण और पंच परिवर्तन

Date : 22-Jan-2026

 भारत में जीवन आदिकाल से अविरल प्रवाह के समान बह रहा है। इसी में अपनी आहुति डालने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार, जो अपने जीवनकाल में राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिये चल रहे सामाजिक, धार्मिक, क्रांतिकारी व राजनैतिक क्षेत्रों के सभी समकालीन संगठनों व आंदोलनों से सम्बध्द रहे व अनेक महत्वपूर्ण आंदोलनों का नेतृत्व भी किया था, उन्होंने समाज के स्वाभिमानी, संस्कारित, चरित्रवान, शक्तिसंपन्न, देशभक्ति से ओत-प्रोत, व्यक्तिगत अहंकार से मुक्त व्यक्तियों के ऐसे संगठन जो स्वतंत्रता आंदोलन की रीढ़ होने के साथ राष्ट्र व समाज पर आने वाली प्रत्येक विपत्ति का सामना कर सके, उसकी कल्पना के साथ संघ का कार्य शुरू किया।

डॉक्टर हेडगेवार द्वारा सन् 1925 में शुरू हुई संघ की यात्रा, शताब्दी वर्ष तक पहुंच कर भारत के कोने-कोने तक फैल चुकी है। इसी के साथ विश्व के लगभग ८० देशों में ५० से अधिक संगठन, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल की मथुरा के परखम गांव में स्थित दीनदयाल उपाध्याय गौ विज्ञान अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र में आयोजित बैठक में भारतीय समाज में अनुशासन के भाव को बढ़ाने के उद्देश्य से सरसंघचालक जी ने पंच परिवर्तन- अपने दैनिक जीवन में सामाजिक समरसता, कुटुंब भाव, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता, स्वदेशी का आग्रह और नागरिक कर्तव्य बोध के पालन आह्वान किया है, जिससे अनुशासन एवं देशभक्ति से ओतप्रोत युवा वर्ग अनुशासित होकर राष्ट्रोन्नयन की दिशा में कार्य करने के लिए उद्यत हों।

आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत जी के शब्दों में, "संघ के प्रति समाज आशान्वित है। ऐसे में जो भी बात हम समाज में रखेंगे, उसे समाज स्वीकार करने के लिए तैयार है इसलिए हमें पूर्ण तैयारी के साथ समाज में जाने की आवश्यकता है।"

सामाजिक समरसता- इसके माध्यम से समाज में जाति और आर्थिक भेदभाव को मिटाना।

कुटुंब प्रबोधन- परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है| परिवार में एक साथ बैठकर भोजन, कीर्तन और त्योहार मना कर हम समाज की टूट रही मूल कड़ी कुटुंब को बनाए रख सकते हैं|

स्वदेशी- दैनिक जीवन में स्वदेशी का प्रयोग कर भारत की आर्थिक उन्नति में अपना सहयोग कर सकते हैं। स्वदेशी के माध्यम से ‘स्व’ का बोध हो और अपनी समृद्ध संस्कृति पर स्वाभिमान होना चाहिये।

पर्यावरण- सनातन में प्रकृति की पूजा की प्रमुखता रही है। अपनी संस्कृति में पेड़ों और जानवरों की पूजा भी की जाती है। अधिक से अधिक पौधे लगा कर, प्रदूषण रोकने के उपायों और नदी, तालाब, पोखर आदि को स्वच्छ बनाते हुए हम इसमें योगदान दे सकते हैं।

नागरिक कर्तव्य- प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के बारे में जानकारी लेकर उनका पालन सुनिश्चित करना चाहिये।नागरिक कर्तव्य, एक समृद्ध और लोकतांत्रिक समाज के स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक तत्त्व होते हैं। नागरिक कर्तव्यों को पूरा करना एक प्रकार से सरकार और जनमानस के बीच एक-दूसरे का सम्मान है।

आज के संदर्भ में हमारे बच्चों को संवैधानिक कर्तव्यों के पालन, राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज का सम्मान, राष्ट्रीय सेवा में योगदान, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना, पर्यावरण की रक्षा, हिंसा से दूर रहने के प्रति शिक्षित करने की आवश्यकता है। हम सभी को अपने राष्ट्र की गरिमा बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए। प्रत्येक नागरिक को थोड़ा समय निकाल कर राष्ट्र निर्माण की दिशा में काम करना ही चाहिए। समाज को छोटे मतभेदों भूलकर एक साथ मिलकर काम करना चाहिए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रे हॉसबोले के शब्दों में, "भारत तेजी से आर्थिक विकास कर रहा है, सामरिक और कूटनीति मोर्चों में बढ़ती महत्ता से सभी परिचित हैं| ऐसे समय में भारतीय समाज को एकजुट होकर सर्वांगीण विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में कार्य करना है| देश और विदेश में ऐसी अनेक शक्तियां हैं जो भारत को इस रास्ते पर आगे बढ़ने से रोकना चाहती हैं| किंतु ‘स्व’ के बोध के साथ हमें मिलकर इन शक्तियों को प्रभाव शून्य बनाना है|"

पंच परिवर्तन के माध्यम से स्वस्थ समाज के निर्माण में योगदान देकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के अविरल जीवन प्रवाह में अपना बहुमूल्य योगदान डाल रहा है।


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