आज के समय में हम लोग अपने भोजन को लेकर बड़े सजग हैं। खाने की हर चीज के बारे में उसकी कैलोरी को देखकर उसे खाने या ना खाने का फैसला लेते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी हो जाता है कि संक्रांति के समय तिल–गुड़ और खिचड़ी क्यों खाना चाहिए, पतंग क्यों उड़ाते हैं। नई पीढ़ी के ढेर सारी सवालों का जवाब आज के विज्ञान की दृष्टि से देखने की कोशिश करते हैं तो ये दिखता है कि हमारे देश में सारे त्योहार प्राकृतिक घटनाओं से जुड़े हुए हैं। मुख्य रूप से ग्रह-नक्षत्रों की गति, अलग-अलग राशियों में भ्रमण के आधार पर उत्सव पर्व मनाए जाते हैं।
शास्त्रों में लिखा है- “माघे मासे तु संप्राप्ते मकरं सूर्यगच्छति। तस्मात् संक्रान्तिरित्युक्ता पुण्यदा पुण्यवर्धिनी॥”
अर्थात - माघ मास में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, उसे मकर संक्रांति कहते हैं। यह पर्व पुण्य देने वाला और पुण्य को बढ़ाने वाला होता है। वास्तव में सूर्य तो अपने अक्ष पर होता है, पृथ्वी और अन्य ग्रह उसके चारों और चक्कर लगाते हैं लेकिन ऐसा कहा जाता है कि जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है यानी पृथ्वी से देखने पर सूर्य मकर राशि में दिखाई देने लगता है तब मकर संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है।
मकर संक्रांति के बाद दिन बड़े होने लगते हैं और रात छोटी होने लगती है। यानी इस दिन से जीवन में प्रकाश का समय बढ़ने लगता है, अंधकार घटने लगता है। हमारी संस्कृति में प्रकाश को ज्ञान का प्रतीक भी माना जाता है अंधकार को अज्ञान कहा जाता है।
संक्रांति का अर्थ है सम्यक क्रांती अर्थात योग्य दिशा में व्यक्ति और समाज का परिवर्तन। समाज को आत्मविस्मृति के अंधकार से बाहर निकाल कर, चेतना के जागृति के, सत्य के प्रकाश की ओर ले जाना सनातन संस्कृति का उद्देश्य है। इस लक्ष्य की याद समाज को करवाने के लिए मकर संक्रांति का उत्सव मनाया जाता है।
मकर राशि में प्रवेश करने वाले सूर्य की महत्ता को बताने वाली एक सूक्ति है– “नमः सूर्याय लोकाय लोकनाथाय भास्वते। सर्वरोगहरायैव मकरस्थाय ते नमः॥“
अर्थात - लोकों को प्रकाशित करने वाले, लोकनाथ, तेजस्वी सूर्यदेव को नमस्कार है। मकर राशि में स्थित सभी रोगों को दूर करने वाले सूर्य को प्रणाम है।
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ साथ में खाने की परंपरा है। शास्त्र कहते है - “तिलगुडैः सह हर्षेण सूर्यपूजा विधीयताम्। मकरसंक्रान्तिकालेऽस्मिन् सर्वे सन्तु निरामयाः॥”
अर्थात मकर संक्रांति के अवसर पर तिल और गुड़ के साथ हर्षपूर्वक सूर्य की पूजा की जाए। इस पावन समय में सभी लोग स्वस्थ और निरोग रहें।
हमारे पूर्वज विज्ञान जानते थे। आज का विज्ञान कहता है तिल में उच्च मात्रा में कैलोरी, प्रोटीन और स्वस्थ वसा होती है, जो ठंडे मौसम में शरीर को ऊर्जा देती है। यह शरीर को गर्म रखने में मदद करता है। साथ ही तिल में कैल्शियम, मैग्नीशियम और जिंक जैसे मिनरल्स होते हैं, जो हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं। सर्दी में हड्डियों में दर्द और समस्याएँ बढ़ सकती हैं, लेकिन तिल इन समस्याओं को कम करने में मदद करता है।
उसी तरह गुड के बारे में आज का विज्ञान कहता है कि गुड़ में प्राकृतिक गर्मी होती है, जो सर्दियों में शरीर को अंदर से गर्म रखने में मदद करती है। सर्दियों में कई बार शरीर में पानी की कमी और पाचन संबंधी समस्याएँ बढ़ जाती हैं और गुड़ इन समस्याओं को हल करने में मदद करता है। सर्दियों में शरीर की इम्युनिटी कमजोर हो सकती है और गुड़ में आयरन और फोलिक एसिड की मौजूदगी से शरीर में खून की कमी पूरी होती है। गुड़ में एंटीऑक्सिडेंट्स होते हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करते हैं। यह सर्दी, जुकाम और फ्लू जैसी मौसमी बीमारियों से बचाव में मदद करता है। इन वैज्ञानिक गुणों के कारण सर्दी में गुड़ और तिल खाने की परंपरा हमारे पूर्वजों ने स्थापित की।
खिचड़ी क्यों खाई जाती है-
मकर संक्रांति के समय शीत ऋतु अपने चरम पर होती है। इस मौसम में पाचन शक्ति कमजोर हो सकती है। खिचड़ी हल्का, सुपाच्य और गर्म भोजन है, जो शरीर को ठंड से संरक्षण देता है और पाचन को संतुलित रखता है। आयुर्वेदिक दृष्टि सेखिचड़ी में चावल और दाल का संयोजन होता है, जिसे आयुर्वेद में “पूर्ण आहार” माना जाता है। दाल से प्रोटीन, चावल से ऊर्जा घी से बल और ओज मिलता है। शीत ऋतु में बढ़ने वाले वात और कफ के दोष को खिचड़ी संतुलित करती हैं। उत्तर भारत, विशेषकर प्रयागराज और पूर्वांचल क्षेत्रों में मकर संक्रांति को “खिचड़ी पर्व” भी कहा जाता है। इस दिन खिचड़ी का दान पुण्यकारी माना जाता है। साधु-संतों और जरूरतमंदों को खिचड़ी खिलाने की परंपरा भी है।
खिचड़ी सादा और सर्वसुलभ भोजन है। इसे सभी वर्गों के लोग एक समान रूप से ग्रहण कर सकते हैं, इसलिए यह समरसता और समानता का प्रतीक भी मानी जाती है। संक्रांति पर खिचड़ी खाना शरीर को स्वस्थ रखने, ऋतु के अनुकूल आहार लेने और धार्मिक पुण्य अर्जित करने, संगठन और समरसता का भाव बढ़ाने का प्रतीक है।
दान का महत्व-
मकरस्थे दिवाकरे दानस्नानतपःक्रियाः। कृताः कोटिगुणं पुण्यं ददाति नात्र संशयः॥
अर्थात - सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर किया गया दान, स्नान और तप करोड़ों गुना पुण्य प्रदान करता है, इसमें कोई संदेह नहीं। इसीलिए मकर संक्रांति के अवसर पर जरूरतमंदों को उनके लिए जरूरी चीजों का दान सक्षम और समर्थ लोगों को करने के लिए कहा गया है।
पतंग की प्रासंगिकता-
इस अवसर पर पतंग उड़ाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, ये भारतीय लोक संस्कृति का हिस्सा है। जो खुशी, उल्लास और उत्सव का प्रतीक है। पतंग उड़ाना एक हल्का व्यायाम है। खुले आकाश में रहने से मानसिक तनाव कम होता है। धूप में रहने से शरीर को विटामिन-D मिलता है जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
समाज संगठन की दृष्टि से संदेश
हमारी मान्यता है कि समाज में परिवर्तन, समन्वय और आत्मीयता पूर्ण व्यवहार से लाया जाना चाहिए। इसके लिए समाज के साथ संपर्क और समाज का संगठन जरूरी है। इस उत्सव में पहले लोग एक दूसरे के घरों पर संपर्क के लिए भेंट के लिए जाया करते थे वहां तिल और गुड़ का सेवन किया जाता था। महाराष्ट्र में आज भी कहा जाता है “तिल गुड घ्या आणि गोड गोड बोला“ इसका अर्थ है आइए तिल गुड खाइए और एक दूसरे से मीठा बोलिए, मधुर व्यवहार कीजिए, यही संगठन का भी मूल सूत्र है।
(लेखक- संस्कृति अध्येता एवं स्तंभकार हैं।)
