रास बिहारी बोस (जन्म: 25 मई 1886; मृत्यु: 21 जनवरी 1945) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महानायकों में से एक थे, जिन्होंने देश की सीमाओं से बाहर जाकर भी भारत की मुक्ति के लिए अथक प्रयास किए। वे प्रख्यात क्रांतिकारी होने के साथ-साथ विद्वान, शिक्षाविद और आज़ाद हिन्द फ़ौज के प्रथम निर्माता भी थे। भारत की स्वतंत्र सरकार के गठन और सशस्त्र क्रांति के लिए योजनाबद्ध प्रयास करने वालों में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रारंभिक विचारधारा और क्रांतिकारी दृष्टि
रास बिहारी बोस प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उदारवादी दल से जुड़े रहे। वे उग्र आंदोलनों को घातक, जनोत्तेजक और अनुत्तरदायी मानते थे, किंतु समय के साथ उन्हें यह अनुभव हुआ कि केवल संवैधानिक उपायों से भारत को स्वतंत्र कराना संभव नहीं है। इसी सोच ने उन्हें सशस्त्र क्रांति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ओर प्रेरित किया। उनका विश्वास था कि विदेशी धरती से अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध वातावरण तैयार कर भारत की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
क्रांतिकारी गतिविधियाँ और 1915 की योजना
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान सशस्त्र क्रांति की जो व्यापक योजना बनी, वह रास बिहारी बोस के नेतृत्व में ही तैयार हुई थी। 1912 में दिल्ली में वाइसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की ऐतिहासिक घटना के पीछे भी वही थे। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए पूरी शक्ति झोंक दी, किंतु वह सफल नहीं हो सकी।
सरकारी सेवा में रहते हुए भी उन्होंने गुप्त रूप से क्रांतिकारी दल का संगठन किया। इसके लिए उन्हें अत्यंत सावधानी के साथ पूरे देश का भ्रमण करना पड़ा। वाराणसी उनका प्रमुख क्रांतिकारी केंद्र रहा, जहाँ गुप्त रूप से रहकर वे आंदोलन का संचालन करते थे। उनके प्रमुख सहयोगी अमर शहीद पिंगले थे।
21 फरवरी 1915 को देशव्यापी सशस्त्र विद्रोह की तिथि निश्चित की गई थी, किंतु एक व्यक्ति द्वारा भेद खोल दिए जाने के कारण यह योजना विफल हो गई। इसके परिणामस्वरूप पिंगले को फाँसी दी गई, जबकि रास बिहारी बोस किसी प्रकार बच निकलने में सफल रहे। 1857 के बाद यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सबसे बड़ा और संगठित क्रांतिकारी प्रयास था।
जापान प्रस्थान और भारतीय स्वातंत्र्य संघ
1915 में रास बिहारी बोस एक ठाकुर परिवार के सदस्य के पारपत्र के माध्यम से गुप्त रूप से भारत से निकलकर जापान पहुँचे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सौंपने की माँग की, जिसे प्रारंभ में जापान सरकार ने स्वीकार भी कर लिया था। किंतु जापान की शक्तिशाली राष्ट्रवादी संस्था ब्लैक ड्रैगन के अध्यक्ष टोयामा ने उन्हें शरण दी। इसके बाद कोई भी जापानी अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने का साहस नहीं कर सका।
लगभग आठ वर्षों तक वे इसी संरक्षण में रहे। बाद में उन्होंने एक जापानी महिला से विवाह किया और स्थायी रूप से वहीं बस गए। 1937 में उन्होंने भारतीय स्वातंत्र्य संघ की स्थापना की और विदेश में रहते हुए भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया। उन्होंने विश्वभर के भारतीयों से स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागी बनने का आह्वान किया।
साहित्यिक योगदान और भाषायी दक्षता
रास बिहारी बोस अनेक भारतीय भाषाओं के ज्ञाता थे, जिसने उन्हें देश-विदेश में क्रांतिकारी संगठन खड़ा करने में विशेष सहायता दी। जापान में रहते हुए उन्होंने जापानी भाषा सीखी और उसी भाषा में भारतीय स्वतंत्रता पर पाँच महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। इनका जापान में व्यापक प्रभाव पड़ा। इसके अतिरिक्त उन्होंने संडरलैंड की प्रसिद्ध पुस्तक ‘पराधीन भारत’ का जापानी भाषा में अनुवाद भी किया।
आज़ाद हिन्द फ़ौज के प्रथम निर्माता
रास बिहारी बोस का सबसे ऐतिहासिक योगदान आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना रहा। उन्होंने ही पहली आज़ाद हिन्द फ़ौज का संगठन किया, जिसके प्रधान मोहन सिंह थे। आगे चलकर इसी आधार पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने द्वितीय आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन किया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी।
रास बिहारी बोस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन अग्रगण्य सेनानियों में से थे, जिन्होंने क्रांतिकारी मार्ग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार दिया। उनका साहस, दूरदृष्टि और संगठन क्षमता स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। भारत को पराधीनता से मुक्त कराने के लिए उनका आजीवन संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
