मोक्ष की नगरी काशी में गंगा किनारे बने 84 घाटों में मणिकर्णिका घाट का स्थान सबसे विशेष माना जाता है। इसे विश्व के सबसे प्राचीन और बड़े श्मशान घाटों में गिना जाता है। इस घाट से जुड़ी सबसे रहस्यमयी बात यह है कि यहां जलती अग्नि कभी शांत नहीं होती। दिन हो या रात, यहां लगातार अंतिम संस्कार होते रहते हैं। इसके पीछे धार्मिक मान्यताएं भी हैं और व्यावहारिक कारण भी। आइए जानते हैं इस रहस्य को विस्तार से।
अखंड अग्नि की पौराणिक मान्यता
मणिकर्णिका घाट से जुड़ी एक प्रचलित आस्था के अनुसार यहां एक पवित्र अग्नि सदियों से जल रही है, जिसे अखंड ज्योति कहा जाता है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस अग्नि को स्वयं भगवान शिव ने प्रज्वलित किया था। घाट पर होने वाले हर अंतिम संस्कार की चिता इसी पवित्र अग्नि से जलाई जाती है। इसी कारण इसे कभी बुझने न देने की परंपरा चली आ रही है।
माता पार्वती से जुड़ी कथा
इस घाट के नाम और महत्व के पीछे एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार माता पार्वती यहां स्नान कर रही थीं, तभी उनकी कान की बाली (मणि) कुंड में गिर गई। काफी खोज के बाद भी जब वह नहीं मिली, तो एक कथा के अनुसार माता पार्वती ने यह स्थान ऐसा होने का वरदान या श्राप दिया कि यहां मृत्यु और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कभी रुकेगी नहीं। तभी से यह घाट लगातार जलती चिताओं का साक्षी बना हुआ है।
हकीकत का पहलू: लगातार होते अंतिम संस्कार
धार्मिक मान्यताओं के अलावा यदि व्यावहारिक स्थिति देखें, तो मणिकर्णिका घाट पर शवों की संख्या बेहद अधिक होती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यहां रोज़ाना औसतन 30 से 35 चिताएं जलती हैं और कई बार यह संख्या इससे भी ज्यादा हो जाती है। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया 24 घंटे चलती रहती है। जैसे ही एक चिता बुझने लगती है, दूसरी की तैयारी शुरू हो जाती है। यही वजह है कि घाट की भूमि कभी ठंडी नहीं पड़ती और अग्नि निरंतर प्रज्वलित रहती है।
मोक्ष का द्वार माना जाता है मणिकर्णिका घाट
हिंदू धर्म में मान्यता है कि इस घाट पर अंतिम संस्कार होने से आत्मा को जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। यही कारण है कि देश ही नहीं, विदेशों से भी लोग अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार के लिए मणिकर्णिका घाट को चुनते हैं। यह घाट केवल श्मशान नहीं, बल्कि मोक्ष की अंतिम सीढ़ी माना जाता है।
धार्मिक आस्था, पौराणिक कथाएं और निरंतर होने वाली क्रियाएं—इन सभी कारणों से मणिकर्णिका घाट की अग्नि सदियों से जलती आ रही है और आगे भी जलती रहेगी।
