भारत को विदेशी शासन की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए जिन वीर सपूतों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, उनमें क्रांतिकारी अमर शहीद हेमू कालाणी का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। मात्र उन्नीस वर्ष की अल्पायु में उन्होंने देश के लिए हँसते-हँसते प्राणों का बलिदान देकर साहस, देशभक्ति और त्याग की अनुपम मिसाल प्रस्तुत की।
प्रारंभिक जीवन
हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को सिंध प्रांत के सक्खर नगर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता पेसूमल कालाणी और माता जेठी बाई थे। बचपन से ही हेमू निर्भीक, साहसी और राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत थे। विद्यालय में अध्ययन के साथ-साथ वे स्वतंत्रता आंदोलन से भी सक्रिय रूप से जुड़ गए थे।
कहा जाता है कि मात्र सात वर्ष की आयु में ही वे हाथ में तिरंगा लेकर अंग्रेजों की बस्ती में चले जाते थे और अपने साथियों के साथ निर्भय होकर सभाएँ किया करते थे। पढ़ाई में मेधावी होने के साथ-साथ वे उत्कृष्ट तैराक और धावक भी थे। तैराकी में उन्हें कई बार पुरस्कार प्राप्त हुए थे, जिससे उनकी शारीरिक क्षमता और आत्मविश्वास का परिचय मिलता है।
भारत छोड़ो आंदोलन और क्रांतिकारी भूमिका
8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी द्वारा दिए गए “अंग्रेज़ो भारत छोड़ो” और “करो या मरो” के नारे ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया। सिंध प्रांत में भी यह आंदोलन तीव्र हो उठा। किशोरों और नवयुवकों के साथ हेमू कालाणी ने भी ‘स्वराज सेना’ के माध्यम से इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
उन्होंने “अंग्रेज़ो भारत छोड़ो” के नारों से सिंधवासियों में जोश और स्वाभिमान का संचार किया। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का संदेश देते हुए वे जनता को आत्मनिर्भरता की राह पर ले जाने का प्रयास कर रहे थे। स्वतंत्रता के संकल्प के साथ वे गुप्त और खुले, दोनों प्रकार की क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए।
बलिदान की ओर बढ़ते कदम
1942 में गुप्त सूत्रों से जानकारी मिली कि अंग्रेज़ सरकार बलूचिस्तान में चल रहे उग्र आंदोलन को दबाने के लिए हथियारों और सैनिकों से भरी एक रेलगाड़ी को 23 अक्टूबर की रात सिंध के रोहिणी स्टेशन से सक्खर होते हुए क्वेटा भेजने वाली है। इस समाचार से अवगत होते ही 19 वर्षीय हेमू कालाणी ने उस रेलगाड़ी को पटरी से उतारने का दायित्व स्वयं संभाल लिया। उनके साथ नंद और किशन नामक दो साथी भी थे।
रात के सन्नाटे में तीनों युवक एक सुनसान स्थान पर पहुँचे। हेमू ने रिंच और हथौड़े की सहायता से रेल पटरियों की फिशप्लेटें उखाड़ना शुरू कर दिया, जबकि उनके साथी निगरानी कर रहे थे। हथौड़े की आवाज़ सुनकर गश्त कर रहे सिपाही वहाँ पहुँच गए। नंद और किशन तो बच निकले, किंतु हेमू कालाणी को अंग्रेज़ों ने पकड़ लिया।
अडिग साहस और फाँसी
जेल में हेमू कालाणी पर अमानवीय अत्याचार किए गए। उनसे उनके साथियों के नाम पूछे गए, किंतु हर बार उनका उत्तर यही था—
“मेरे दो साथी थे: रिंच और हथौड़ा।”
सक्खर की मार्शल लॉ कोर्ट ने उनकी अल्पायु को देखते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई, किंतु हैदराबाद (सिंध) स्थित सैन्य मुख्यालय के अधिकारी कर्नल रिचर्डसन ने उन्हें “ब्रिटिश राज का खतरनाक शत्रु” बताते हुए सजा को फाँसी में बदल दिया।
21 जनवरी 1943 को प्रातः 7 बजकर 55 मिनट पर हेमू कालाणी को फाँसी दी गई। उन्होंने “इंकलाब ज़िंदाबाद” और “भारत माता की जय” के नारों के साथ स्वयं अपने हाथों से फंदा गले में डाला, मानो वे मृत्यु नहीं, बल्कि फूलों की माला पहन रहे हों।
अमर स्मृति
मात्र 19 वर्ष की आयु में दिया गया हेमू कालाणी का यह बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अविस्मरणीय अध्याय है। स्वतंत्रता के बाद संसद परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई और भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया।
अमर शहीद हेमू कालाणी का जीवन और बलिदान आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि देश की स्वतंत्रता के लिए उम्र नहीं, बल्कि अटूट संकल्प और अदम्य साहस की आवश्यकता होती है।
