डॉ. प्रभात ओझा
वेनेजुएला पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्रवाई को ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ नाम दिया गया। हिन्दी में जो अर्थ निकलते हैं, उनमें किसी समस्या का पूर्ण रूप से समाधान निकलना अथवा ‘पूर्ण संकल्प’ भी शामिल हैं। यहां आमतौर पर दूसरा अर्थ लिया गया है। कहा जा रहा है कि अमेरिका ने जो तय किया था, उसने कर दिखाया। वैसे पहले अर्थ की व्याप्ति और अधिक है। यह किसी समस्या का समाधान कर लेने में व्यक्त किया जाता है। बहरहाल, दोनों ही अर्थ एक ही तरह के संकेत करते हैं। वैसे, प्रारम्भिक तौर पर तो यही लगता है कि यह अभी शुरुआत है, समाधान नहीं।
अमेरिका का यह कदम न सिर्फ वेनेजुएला के लिए, बल्कि शांति और लोकतंत्र के समर्थक देशों के खिलाफ जाने वाला है। ऐसा मानने के आधार भी हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि दुनिया के अधिकांश हिस्सों में इसे किसी देश की संप्रभुता पर हमले की तरह देखा गया है, बल्कि इसलिए भी कि स्वयं अमेरिका के अंदर भी इस पर विरोध के स्वर उभरे हैं। रॉबर्ट प्रीवोस्ट पीटर के पूर्व नाम वाले पोप लियो 14वें इस आसन पर आने वाले पहले अमेरिकी मूल के संत हैं। उन्होंने भी वेनेजुएला की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए इस देश की संप्रभुता सुनिश्चित किए जाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि संविधान, कानून, मानव और नागरिक कानूनों का सम्मान करते हुए आगे बढ़ा जाना चाहिए। इसी तरह की प्रतिक्रिया कई देशों ने भी दी है। हालांकि, भले यह सामान्य सा बयान लगता है, बहुत दूर तक जा सकता है। अमेरिका के अंदर ही न्यूयॉर्क शहर के नवनिर्वाचित मेयर जोहरान मामदानी की प्रतिक्रिया काबिल-ए-गौर है। उन्होंने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को न्यूयॉर्क लाने की जानकारी देते हुए कहा कि उनकी गिरफ्तारी ‘किसी संप्रभु राष्ट्र पर एकतरफा हमला’ है। यह युद्ध का कृत्य है और संघीय तथा अंतरराष्ट्रीय कानून का स्पष्ट उल्लंघन है।
लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर देश-विदेश की किसी प्रतिक्रिया का असर नहीं हो रहा है। अमेरिकी संविधान और परंपरा से मिले असीमित अधिकारों के तहत उन्होंने यह कार्रवाई की है। भविष्य तय करेगा कि अमरीकी संसद इस पर मुहर लगाती है अथवा नहीं। अभी एक बात साफ है कि अमेरिका के इस एक्शन से क्षेत्रीय अंसतुलन को न सिर्फ बढ़ावा मिलेगा, वरन प्रतिगामी शक्तियों को एक और केंद्र मिल जाएगा। अनुभव यही बताते हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि इसमें राष्ट्रपति ट्रंप के अपने व्यक्तिगत हित भी हैं। दुनिया जानती है कि वे राजनेता से पहले व्यवसायी भी हैं। ट्रंप के पीछे हथियार बनाने वाली कंपनियां मुस्तैदी के साथ खड़ी हैं। दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने इन कंपनियों को दुनिया भर में व्यवसाय करने में मदद ही की है। अशांत वेनेजुएला भी इसमें शामिल हो जाएगा।
व्यक्ति से अलग ट्रंप को राष्ट्रपति के तौर पर भी देखने से भी नहीं लगता कि अमेरिका को अथवा शेष विश्व को इस कार्रवाई से कोई फायदा मिलने वाला है। अनुभव यही हैं कि अफगानिस्तान से अमेरिका को वापस लौटना पड़ा। हजारों अमेरिका सैनिक मारे गये, करीब दो ट्रिलियन डॉलर स्वाह हो गये और परिणाम के तौर पर जिन तालीबानी को नष्ट करने के नाम पर अमेरिका घुसा था, वहां वे ही तालिबानी सत्ता में वापस आ गए। कथित रूप से अफगानिस्तान में लोकतंत्र मजबूत करने का दावा धूल-धूसरित हो गया। इराक में भी सद्दाम हुसैन को अपदस्थ करने और फांसी देने के बावजूद देश शांति के रास्ते पर नहीं आ सका। वहां से करीब 30 लाख लोग विस्थापित हुए और इराक पर आतंकवादी संगठनों का कब्जा हो गया। लीबिया में कर्नल गद्दाफी के साथ यही हुआ। उन्होंने अमेरिका अर्थव्यवस्था के साथ चलने से इनकार कर दिया था। उनकी हत्या कर दी गई। सीरिया में भी आतंकवादियों के सफाये के नाम पर अमेरिका की कार्रवाई की किरकिरी हुई। वहां जो अहमद अल शारा राष्ट्रपति बने, उन पर खुद अमेरिका ने इनाम घोषित किया था। अभी दो महीने पहले जब शारा अमेरिका यात्रा पर पहुंचे, उसके ठीक पहले अमेरिका प्रशासन ने उनका नाम आतंकवादियों की सूची से बाहर निकाला।
गाजा का उदाहरण भी सामने है, जहां कई लाख लोग मारे गए और 21 लाख लोग बेघर बना दिये गए। और उधर, अमेरिका राष्ट्रपति इजराइल में नेतन्याहू के साथ दावत कर रहे थे। इन सभी उदाहरण में गौर से देखें, तो अमेरिका में इन देशों पर कार्रवाई के समय जो भी सत्तारूढ़ हो, कारण सिर्फ एक है। ये सभी तेल उत्पादक देश हैं अथवा किसी ना किसी रूप में उनसे जुड़े हैं और उन्होंने डॉलर की जगह दूसरी मुद्रा में व्यापार करना शुरू किया था। अमेरिका के हक में जिस पेट्रो डॉलर अर्थव्यवस्था की बात की जाती है, वह इससे प्रभावित हुई। इससे वह बौखला उठा।
करीब 303 अरब बैरल प्रमाणित तेल भंडार वाला वेनेजुएला उसे चीनी युआन में बेच रहा था, अमेरिका डॉलर में नहीं। वर्ष 2018 से उसने युआन के साथ यूरो और रूबल में तेल का भुगतान लेना शुरू कर दिया। उधर, 1974 में ही अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति हेनरी किसिंजर ने सऊदी अरब के साथ समझौता किया कि दुनिया भर में बिकने वाले तेल की कीमत अमेरिकी डॉलर में तय किया जाएगा। इस एक समझौते से दुनिया भर में डॉलर की मांग बढ़ गई। उसी के बाद 2000 में सद्दाम हुसैन के तेल को डॉलर की बजाय यूरो में बेचना अमरीका को नागवार गुजरा। 2003 में वहां आक्रमण हुआ। शासन बदला और फिर इराक का तेल डॉलर में बेचा जाने लगा। 2009 में लीबिया वाले गद्दाफी ने सोना आधारित अफ्रीकी मुद्रा ‘गोल्ड दीनार’ का प्रस्ताव रखा। हिलेरी क्लिंटन के लीक ई-मेल से स्पष्ट हुआ कि लीबिया में दखलंदाजी का कारण भी यही बना था। 2011 में लीबिया पर बमबारी और गद्दाफी की हत्या हुई। वहां अब बाजार पर कोई रोक नहीं है। गोल्ड दीनार का भी कोई नामलेवा नहीं है। अब वेनेजुएला के मादुरो भी यही कर रहे थे। वे ब्रिक्स में भी शामिल होना चाहते थे। स्पष्ट है कि पेट्रो डॉलर को चुनौती देने वाला किसी न किसी तरह से हटा दिया जाता है।
सच यह है कि वेनेजुएला भी इसी पेट्रो डॉलर आधारित व्यवसाय से अलग चलने लगा था। मादुरो के पूर्ववर्ती राष्ट्रपति शावेज के समय पृष्ठभूमि तब बनी, जब उन्होंने अपने यहां तेल उत्पादक कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था। इससे अमेरिका हित प्रभावित होना शुरू हो गया। मादुरो ने अगले कदम भी उठाए। इस पर उन्हें ड्रग माफियाओं का लीडर बताकर घेरना शुरू हुआ। अमेरिका ड्रग खपत वाला बड़ा केंद्र है। वहां की कंपनियां बाहर से कच्चा माल लाती हैं। अमेरिका के लिए वेनेजुएला से तेल लेना सहज नहीं रहा। उधर अफीम, कोकीन और हेरोइन जैसे मादक पदार्थ अमेरिका लाने वाली कंपनियां भी बेहाल थीं। वैसे वेनेजुएला पर ड्रग माफिया होने के आरोप इस तरह भी कमतर से लगते हैं कि वहां से इन पदार्थों का अमेरिका को सप्लाई उसकी जरूरत का सिर्फ ए फीसद आंका गया है। प्रश्न बना रहेगा कि वेनेजुएला के खिलाफ नार्को टेररिज्म के प्रमाण थे तो अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र संघ में क्यों नहीं रखा। वह खुद ही जज क्यों बन जाता है। बहरहाल, अमेरिका पूरी तरह से वेनेजुएला का शासन अपने हाथों में लेने जा रहा है। सबसे पहले नजर तेल पर है। आगे की राह उसके पिछले अनुभवों जैसी ही हो, तो कुछ अलग नहीं होगा। तब तक एक और देश बहुत तबाह हो चुका होगा।
