शिक्षाप्रद कहानी:- धर्म की सूक्ष्म गति
Date : 19-Oct-2024
यह उस समय की बात है, जब कश्मीर में महाराज यशस्करदेव का शासन था | प्रजा का जीवन धर्म, सत्य और न्याय के अनुरूप था | महाराज स्वयं रात-दिन प्रजा का हित चिंतन किया करते थे | एक दिन वे सायंकाल वंदन समाप्त करके भोजन करने ही जा रहे थे कि द्वारपाल ने एक ब्राम्हण के राजद्वार पर आमरण अनशन की सूचना दी |
महाराज ने भोजन का कार्यक्रम स्थगित कर दिया | वे बाहर आ गये | उन्होंने ब्राम्हण को दु:खी देखा, तो उनका हृदय करुणा से द्रवित हो उठा |
ब्राम्हण ने महाराज यशस्करदेव को एक प्रकार से सावधान सा करते हुए कहा-“महाराज! आप अपने राज्य में अन्याय का प्रचार कर रहे हैं | प्रजा का मान अधर्म में सुख मान रहा है | यदि आप ठीक तरह न्याय नहीं करेंगे, तो राजद्वार ब्राम्हण की समाधि के रूप में परिणत हो जायेगा |”
“ब्राम्हण देवता! मैं आपके कथन का आशय नहीं समझ पाया हूँ | मुझे अपने न्याय-विधान पर भरोसा है | आप जो कुछ कहना चाहते हैं, वह कह डालिए | संकोच मत कीजिए | कहीं ऐसा तो नहीं है कि द्वारपाल के कहने से कि मुझसे कल भेंट हो सकेगी, आपने प्राण त्याग का निश्चय कर लिया है ?”
“नहीं महाराज! मैं विदेश में जाकर धन अर्जित करता रहा था | वहाँ से 100 स्वर्ण मुद्राएँ अर्जित कर आपके राज्य में प्रविष्ट हुआ था | मुझे पता चला कि आपके शासनकाल में कश्मीर में स्वराज्य आ गया है | मार्ग में मैंने इसका प्रत्यक्ष अनुभव किया है | पर लवणोत्स ग्राम के निकट आते-आते मैं थक गया | रात में एक रमणीय उद्यान में एक वृक्ष के नीचे शयन करने लग गया | दैवयोग से मेरे शयन स्थल के निकट घास से आच्छादित एक कूप था जिसका पता मुझे नहीं था | उसमें मेरी स्वर्णमुद्राओं की गठरी गिर गयी | सवेरा होने पर मैंने कूप में कूदकर प्राण त्याग का निश्चय किया था कि ग्राम वाले एकत्र हो गये | उसमें से एक साहसी व्यक्ति ने कहाँ- “यदि मैं गठरी निकाल दूँ, तो क्या दोगे?”
मैंने कहा-“उस धन पर मेरा अधिकार ही क्या रह गया है, तुमको जो ठीक लगे, वह मुझे दे देना |
“उसने गठरी निकाल ली और मुझे केवल दो मुद्राएँ दी | मैंने इस पर आपत्ति की तो उसने कहाँ कि महाराज यशस्करदेव के राज्य में व्यवहार मनुष्य के वचन पर चलते हैं | सरलता के कारण इस औपचारिक वचन के कथन से मेरा धन उसने हड़प लिया | इसका उत्तरदायित्व आप पर है, अन्याययुक्त व्यवहार राज्य में आपके नाम पर होता है |”
यह सब सुन महाराज ने कहा कि इसका निर्णय कल किया जायेगा और ब्राम्हण को साथ लेकर वे भोजन करने चले गये |
महाराज ने लवणोत्स ग्राम के लोगों को दुसरे दिन के लिए बुलवा रखा था | यथासमय ग्रामवासी एकत्र हो गये | ब्राम्हण ने पोटली निकालने वाले आदमी को आकृति से पहचाना | महाराज धर्म आसन पर विराजमान थे |
महाराज ने पोटली निकालने वाले से घटना का विवरण पूछा तो वह बोल-“महाराज! ब्राम्हण ने जो कुछ भी कहा है, वह अक्षरश: सत्य है | मैंने भी सत्य का पालन किया है | वचन के अनुरूप आचरण किया है महाराज |”
पोटली निकालने वाले ने यशस्करदेव को सत्य की स्वीकृति से विस्मित कर दिया था| वे गंभीर होकर सोचने लगे |
“98 मुद्राएँ ब्राह्मण को दी जाएँ और दो मुद्राएँ पोटली निकालने वाले की है |” महाराज ने निर्णय दिया|
लोग शंकित हो उठे | महाराज ने समझाते हुए कहा-“ ब्राम्हण ने यह नहीं कहा था कि जो देते हो वह दो | उन्होंने कहा था कि जो ठीक लगे वह दो | पोटली निकालनेवाले को अपने लिए 98 मुद्राएँ ठीक लगीं, लेकिन ठीक मुद्राओं पर ब्राम्हण का हक़ है | “
महाराज के जयनाद से सभा भवन गूंज उठा |