पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय छत्तीसगढ़ की महान साहित्यिक विभूतियों में अग्रणी स्थान रखते हैं। उनके द्वारा रचित ‘कलिकाल’ (1905) को छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला नाटक माना जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने में उनका योगदान ऐतिहासिक और अविस्मरणीय है। वे साहित्यकार होने के साथ-साथ उपन्यासकार, इतिहासकार और पुरातत्वविद भी थे।
पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय का जन्म 4 जनवरी 1887 को महानदी तट स्थित ग्राम बालपुर में हुआ तथा उनका निधन 8 नवम्बर 1959 को हुआ। बालपुर पहले बिलासपुर जिले में था, जो वर्तमान में जांजगीर-चाम्पा जिले में स्थित है और रायगढ़ से निकट है। इसी कारण उनका अधिकांश साहित्यिक सृजन रायगढ़ क्षेत्र में हुआ।
वे आधुनिक हिन्दी कविता के छायावाद प्रवर्तक और पद्मश्री सम्मानित मुकुटधर पाण्डेय के बड़े भाई थे। हिन्दी साहित्य के प्रारंभिक दौर में दोनों भाइयों की रचनाएँ देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती थीं। पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय हिन्दी, छत्तीसगढ़ी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी और ओड़िया भाषाओं के विद्वान थे।
डॉ. विनय कुमार पाठक के अनुसार, ‘कलिकाल’ छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला नाटक है, जिसमें लरिया उपबोली का प्रभाव दिखाई देता है। यह प्रभाव उनके जन्मस्थल और कर्मभूमि के ओड़िशा सीमा से जुड़े होने के कारण स्वाभाविक है।
उनका हिन्दी उपन्यास ‘दो मित्र’ (1906) और ओड़िया काव्य संग्रह ‘महानदी’ (1910) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। विभिन्न विधाओं में उनकी लगभग 40 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया तथा 1923 में छत्तीसगढ़ गौरव प्रचारक मंडली की स्थापना की।
उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान के लिए उन्हें ‘काव्य विनोद’, ‘रजत मंजूषा’ और ‘साहित्य वाचस्पति’ जैसी प्रतिष्ठित उपाधियों से सम्मानित किया गया। छत्तीसगढ़ की भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
