संघ के मूल चरित्र और इसकी कार्य-पद्धति का निर्णय पहले तीन सरसंघचालकों की कार्यअवधि के दौरान ही हुआ है। संघ के पहले तीन सरसंघचालक थे डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (1925-1940), माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरु जी (1940-1973) तथा मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहेब देवरस (1973-1994)। इन तीनों सरसंघचालकों ने अपने बौद्धिक-चिंतन तथा अथक परिश्रम के माध्यम से संघ का मार्गदर्शन किया | आज हम संघ के तीसरे सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहेब देवरस जी की 108 वी जयंती में उनके बारे में कुछ बाते जानेगे
बालासाहब अक्सर सरसंघचालक के रूप में अपनी नियुक्ति के संदर्भ में एक किस्सा सुनाया करते थे |
वो कहते थे, ‘एक अत्यधिक मोटा व्यक्ति एक बार ट्रेन में सफर कर रहा था | वह इतना मोटा था कि जब वह एक स्टेशन पर उतरना चाहता था, उसने अपनी पीठ प्लेटफार्म की ओर करते हुए उतरने का यत्न किया | चूंकि वहां अत्यधिक भीड़ थी, लोगों को यह ज्ञान न हुआ कि वह उतरना चाह रहा है, तो उन्होंने उसे ऊपर धकेल दिया और वह फिर से ट्रेन के भीतर आ गया और ट्रेन चल पड़ी. इस प्रकार मेरी दशा भी ठीक वैसी ही है| मैं कभी नहीं चाहता था कि मैं सरसंघचालक बनूं, परंतु सबने मुझे अंदर धकेल दिया और मैं सरसंघचालक बन गया | अब मैं केवल आपके विश्वास के माध्यम से ही सफलता पा सकूंगा |’
बालासाहब को जब ‘परम पूजनीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस’ से संबोधित किया जाने लगा तो आरंभ में असहज अनुभव करते थे, वे एक व्यक्ति के लिए प्रयुक्त अभिव्यक्ति ‘परम पूजनीय’ से बिल्कुल भी सहज अनुभव न करते थे, परंतु फिर काफी चर्चा के बाद जब सब इस बात पर एकमत थे कि ‘परम पूजनीय’ की अभिव्यक्ति किसी व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि इसका अर्थ सरसंघचालक के पद के प्रति निकाला जाना चाहिए,
सरसंघचालक बन जाने के बाद बालासाहब देश भर में प्रवास पर निकल पड़े. उन्होंने बड़ी संख्या में एकत्र लोगों, सार्वजनिक सभाओं, सम्मेलनों आदि को संबोधित किया. जिन लोगों ने उन कार्यक्रमों में भाग लिया, उनकी एक बड़ी संख्या स्वयंसेवकों की थी |
वर्ष 1984 में, जब सरसंघचालक के रूप में अपने वार्षिक भाषण में विजयादशमी के अवसर पर (जिसे समकालीन और विचारधारा संबंधी मुद्दों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ठहराव तथा दृष्टिकोण का परिचायक माना जाता है) बालासाहब ने हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों को इकट्ठा करने की आवश्यकता पर बल दिया |
वर्ष 1985 में बालासाहब ने निर्णय लिया कि वे संघ के कार्यों की समीक्षा करेंगे और बदलते समय के साथ इसके भविष्य के दिशानिर्देश जारी करेंगे| यह अवसर था संगठन द्वारा 60 वर्ष पूरे किए जाने का
नागपुर में एक पथ-प्रवर्तक भाषण में वर्ष 1985 में उन्होंने कहा कि यद्यपि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 60 वर्ष पूरे कर लिये हैं, मगर जो प्रगति हुई है, वह संतोषजनक नहीं है और हमें अभी बहुत कुछ करना बाकी है
उन्होंने सभी स्वयंसेवकों का एक निर्णायक आह्वान किया, ‘हम सभी को आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है| यह समय है कि हम हर प्रकार की नकारात्मकता छोड़ एक नए मार्ग का निर्माण करें | उन्होंने निर्देश दिए कि ‘परम पूजनीय’ शब्द का प्रयोग केवल डॉ. हेडगेवार तथा श्री गुरुजी के नामों के साथ ही किया जाए, अन्य किसी व्यक्ति के नाम के साथ नही किया जायेगा | यह उपाधि केवल सरसंघचालक दायित्व के साथ ही लगाई जाए, व्यक्ति के नाम से पूर्व केवल माननीय का प्रयोग किया जाए। उन्होंने संघ के कार्यक्रमों में केवल प्रथम दो सरसंघचालकों के चित्रों को ही रखे जाने का अनुमोदन किया, जो अब तक इसका पालन किया जा रहा है |
अयोध्या में विवादग्रस्त ढांचे को गिराए जाने के पश्चात केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया | बालासाहब का स्वास्थ कमजोर हो गया था, परंतु गंभीर स्वास्थ समस्याओं के बावजूद वे दिन-रात संघकार्य में लगे रहे |
वर्ष 1993 में प्रतिबंध हटा लिया गया, तब उन्होंने सरसंघचालक का प्रभार किसी अन्य को सौंपने की बात सोची यह एक अविस्मरणीय घोषणा थी, जब किसी सरसंघचालक की नियुक्ति पहली बार एक दूसरे सरसंघचालक ने अपने जीवित रहते हुए की |
11 मार्च, 1994 के दिन उन्होंने नए सरसंघचालक के रूप में रज्जू भैया के नाम की घोषणा कर दी | यह परंपरा उसके बाद निरंतर चल रही है. रज्जू भैया ने बागडोर के.एस. सुदर्शन जी को सौंपी और स्वयं को कार्यभार मुक्त किया तथा सुदर्शनजी ने बाद में यह जिम्मेदारी मोहन भागवत के हाथों में सौंप दी |
