नवरात्रि के नौं दिन माँ की पूजा-अर्चना पूरे विधि- विधान से की जाती है , आज नवरात्र का छटवा दिन माँ के नौं रूपों में से एक रूप कात्यायनी की अराधना की जाति है |
छटवां दिन माँ कात्यायनी- नवरात्रि के छठे दिन कात्यायनी की पूजा की जाती है, यह दिन माँ कात्यायनी को समर्पित होता है और उनके चार हाथ हैं | साथ ही वह बाघ की सवारी करती हैं और उनके हाथ में तलवार है | माँ कात्यायनी की पूजा करने से बीमारी और भय दूर होते हैं | इस दिन लाल रंग के कपड़े पहनकर पूजा करनी चाहिए और पूजा के बाद शहद का भोग लगाना चाहिए |
भोग- शहद का भोग |
रंग- लाल |
मंत्र- ॐ यें व्हीं क्लीं कात्यायनी नम: |
नवरात्रि के नौं दिन माँ की पूजा-अर्चना पूरे विधि- विधान से की जाती है, आज नवरात्र का पांचवां दिन माँ के नौं रूपों में से एक रूप स्कंदमाता की प्रार्थना की जाति है |
पांचवां दिन माँ स्कंदमाता – नवरात्रि के पांचवें दिन माँ स्कंदमाता की आराधना की जाती है, माता के चार हाथ और तीन आंखें हैं | भगवान कार्तिकेव की माता है देवी स्कंधमाता | दुर्गा देवी के स्वरूप से खुशी, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है | माता की पूजा के बाद केले का भोग लगाने से शारीरिक स्वास्थ्य हमेशा स्वस्थ रहता है |
भोग- केले का भोग |
रंग- सफेद |
मंत्र- ओम यें व्हीं क्लीं स्कंधमाताये नम: |
नैना देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में है। यह शिवालिक पर्वत श्रेणी की पहाड़ियों पर स्थित एक भव्य मंदिर है। यह देवी के 51 शक्तिपीठों में शामिल है। यह तीर्थ स्थल हिंदूओं के पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। यह समुद्र तल से 11000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती के नेत्र गिरे थे।
मंदिर में पीपल का पेड़ मुख्य आकषर्ण का केंद्र है जो शताब्दियों पुराना है। मंदिर के मुख्य द्वार के दाई ओर भगवान गणेश और हनुमान कि मूर्ति है। मंदिर के गर्भ ग्रह में मुख्य तीन मूर्तियां हैं। दाई तरफ माता काली की, मध्य में नैना देवी की और बाई ओर भगवान गणेश की प्रतिमा है। यहां एक पवित्र जल का तालाब है, जो मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित है। मंदिर के समीप एक गुफा है जिसे नैना देवी गुफा के नाम से जाना जाता है।
पौराणिक कथाएँ
एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवी सती ने खुद को यज्ञ कुंड झोंक दिया, जिससे भगवान शिव व्यथित हो गए। उन्होंने सती के शव को कंधे पर उठाया और तांडव नृत्य शुरू कर दिया। ऐसा करने स्वर्ग में विद्यमान सभी देवता भयभीत हो गये कि भगवान शिव का यह रूप प्रलय ला सकता है।
देवताओं ने भगवान विष्णु से यह आग्रह किया कि अपने चक्र से सती के शरीर को 51 टुकड़ों में काट दें। विष्णु जी ने सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिये। शरीर का जो भाग जिस क्षेत्र में गिरा वहॉ पर एक शक्ति पीठ की स्थापना हो गई। इस प्रकार से पूरे भारत वर्ष में 51 शक्ति पीठियॉ स्थापित हो गई। उन्हीं 51 शक्ति पीठियों में से एक शक्ति पीठ श्री नैना देवी मंदिर है, जहां पर माता सती की आंखें गिरी थी।
एक और कथा के अनुसार नैना नाम का गुज्जर लड़का अपने मवेशियों को चराने गया तो वहॉ पर देखा कि एक सफेद गाय अपने स्तनों से एक पत्थर पर दूध धार गिरा रही थी। उसने यह दृश्य अगले कई दिनों तक लगातार देखा। फिर एक रात जब वह सो रहा था, उसने देवी माँ को सपने मे यह कहते हुए देखा कि वह पत्थर ही उनकी पिंडी है। नैना गुर्जर ने पूरी स्थिति और अपने सपने के बारे में राजा बीर चंद को बताया। जब राजा ने देखा कि गुर्जर की बात सत्य है तो, राजा ने उसी स्थान पर श्री नयना देवी नाम के मंदिर का निर्माण करवाया।
किंवदंतियों के अनुसार, महिषासुर एक शक्तिशाली राक्षस था जिसे श्री ब्रह्मा द्वारा अमरता का वरदान प्राप्त था, लेकिन उस पर शर्त यह थी कि वह एक अविवाहित महिला द्वारा ही परास्त हो सकता था। इस वरदान के कारण, महिषासुर ने पृथ्वी और देवताओं पर आतंक मचाना शुरू कर दिया। राक्षस के साथ सामना करने के लिए सभी देवताओं ने अपनी शक्तियों को संयुक्त किया और एक देवी को बनाया जो उसे हरा सके।
देवी को सभी देवताओं द्वारा अलग अलग प्रकार के हथियारों की भेंट प्राप्त हुई। महिषासुर देवी की असीम सुंदरता से मंत्रमुग्ध हो गया और उसने शादी का प्रस्ताव देवी के समक्ष रखा। देवी ने उसके समझ एक शर्त रखी कि अगर वह उसे हरा देगा तो वह उससे शादी कर लेगी। लड़ाई के दौरान, देवी ने दानव को परास्त किया और उसकी दोनों आंखें निकाल दीं।
आपदर्थे धनं रक्षेद दारान रक्षेद धनैरपि |
आत्मानं सततं रक्षेद दारैरपि धनैरपि ||
विपत्ति के समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए | धन से अधिक रक्षा पत्नी की करनी चाहिए | किन्तु अपनी रक्षा का प्रश्न सम्मुख आने पर धन और पत्नी का बलिदान भी करना पड़े तो भी नहीं चुकना चाहिए |
संकट, दुःख में धन ही मनुष्य के कम आता है | अतः ऐसे संकट में समय में संचित धन ही कम आता है इसलिए मनुष्य को धन की रक्षा करनी चाहिए | पत्नी धन से भी बढ़कर है , अतः उसकी रक्षा धन से पहले करनी चाहिए | किन्तु धन एवं पत्नी से पहले तथा इन दोनों से बढ़कर अपनी रक्षा करनी चाहिए | अपनी रक्षा होने पर इनकी तथा अन्य सबकी भी रक्षा की जा सकती है |
आचार्य चाणक्य धन के महत्त्व को कम नहीं करते क्योंकि धन से व्यक्ति के अनेक कार्य सधते हैं किन्तु परिवार की भद्र महिला, स्त्री अथवा पत्नी के जीवन-सम्मान का प्रश्न सम्मुख आ जाने पर धन की परवाह नहीं करनी चाहिए | परिवार के मान-मर्यादा से ही व्यक्ति की अपनी मान-मर्यादा है | वही चली गई तो जीवन किस काम का और वह धन किस कम का ? पर जब व्यक्ति की स्वयं की जान पर बन आवे तो क्या धन, क्या स्त्री , सभी की चिंता छोड़ व्यक्ति को अपने जीवन की रक्षा करनी चाहिए | वह रहेगा तो ही पत्नी अथवा धन का उपभोग कर सकेगा वरना सब व्यर्थ ही रह जायेगा | राजपूत स्त्रियों ने जब यह अनुभव किया कि राज्य की रक्षा कर पाना या उसे बचा पाना असंभव हो गया तो उन्होंने जौहर व्रत का पालन किया और अपने प्राणों की आहुति दे दी | यही जीवन का धर्म है |
नवरात्रि के नौं दिन माँ की पूजा-अर्चना पूरे विधि- विधान से की जाती है , आज नवरात्र का चौथा दिन माँ के नौं रूपों में से एक रूप कुष्मांडा की अराधना की जाति है |
चौथा दिन माँ कुष्मांडा- नवरात्रि के चौथे दिन दुर्गा देवी के रूप माँ कुष्मांडा की पूजा की जाती है , इस दिन नारंगी रंग के कपड़े पहनकर पूजा करने से माता प्रसन्न होती है और आशीर्वाद देती है | नारंगी रंग ख़ुशी और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है | माँ के चेहरे पर मुस्कान दिखाई देती है | माँ की पूजा करने से हमारे जीवन के दुःख दूर होते हैं| माँ कुष्मांडा को सिद्धि देवी भी कहा जाता है | मालपुओं का भोग लगाने और मंदिर में बाँटने से माता खुश होकर बुद्धि देती है |
भोग – मालपुओं का भोग |
रंग- नारंगी|
मंत्र- ॐ यें व्हीं क्लीं कुष्मांडाये नम: |
स्वामी रामदासजी का यह नियम था कि वे स्नान एवं पूजा से निवृत्त्त हो भिक्षा माँगने के लिए केवल पाँच ही घर जाते थे और कुछ न कुछ लेकर ही वहाँ से लौटा करते |
एक बार उन्होंने एक घर के द्वार पर खड़े होकर ‘जय-जय रघुवीर समर्थ’ का घोष किया ही था कि गृहस्वामिनी, जिसकी थोड़ी ही देर पूर्व अपने पति से कुछ कहा – सुनी हुई थी और जो गुस्से में थी, बाहर आयी और चिल्लाकर बोली, तुम लोगों को भीख मांगने के अलावा कोई दूसरा धंधा ही नहीं | मुफ्त मिल जाता है, अतः चले आते हो | मेरे घर में तुम्हारी डाल न गलेगी, जाओ कोई दूसरा घर ढूँढ़ों |’’
स्वामीजी हँसकर बोले, ‘माताजी ! मैं खाली हाथ किसी द्वार में वापस नहीं जाया करता | कुछ न कुछ तो लूँगा ही |’
वह गृहस्वामिनी भोजनोप्रान्त चौका लीप रही थी और उसके हाथ में लीपने का कपड़ा था | वह उसे ही उनकी झोली में डालते हुए बोली, ‘तो ले यह कपड़ा और कर अपना मुँह काला यहाँ
से |’
स्वामीजी प्रसन्न हो वहाँ से निकले और नदी पहुँचे | उन्होंने उस कपड़े को साफ किया और उसकी बत्तियां बनायीं तथा वे एक देवालय पहुँचे | इधर जब वे यह कपड़ा धो रहे थे, तो इधर उस स्त्री का हृदय भी पसीजने लगा और उसे पश्चाताप होने लगा कि उसने व्यर्थ ही एक सत्पुरुष का निरादर किया | उसे इतना रंज हुआ कि वह विक्षिप्त हो उन्हें खोजने के लिए दौड पड़ी | अंत में वह उस देवालय जा पहुँची | वह स्वामीजी के चरणों पर गिर पड़ी और बोली, ‘देव! मैंने सरीखे धर्मात्मा का निरादर किया | मुझे क्षमा करें |’ और उसके नेत्रों में अश्रुधारा बह निकली |
रामदासजी बोले, ‘देवी! तुमने उचित ही भिक्षा दी थी | तुम्हारी भिक्षा का ही प्रताप है कि यह देवालय प्रज्ज्वलित हो उठा है | अन्यथा तुम्हारा दिया हुआ भोजन तो जल्द ही खत्म हो गया होता |’
नवरात्रि के नौं दिन माँ की पूजा-अर्चना पूरे विधि- विधान से की जाती है , आज नवरात्र का तीसरा दिन माँ के नौं रूपों में से एक रूप चंद्रघंटा की अराधना की जाति है |
तीसरा दिन माँ चंद्रघंटा – माँ चंद्रघंटा बुरे कुकर्मों और पापों से मुक्ति दिलाती है | नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है | माता के मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करती है | इस दिन भूरे या ग्रे कलर के कपड़े पहनकर माता की पूजन करना चाहिए | ये रंग बुराई को नष्ट करके दृढ संकल्प को जगाता है | इनकी पूजा से सकारात्मकता महसूस होती है | माँ चंद्रघंटा को दूध, दूध से बनी मिठाई या खीर का भोग लगाकर ब्राम्हणों को खिलने से वे सभी दुखों को दूर करती है |
भोग- दूध, मिठाई खीर का भोग |
रंग- भूरा या ग्रे |
मंत्र जाप – ॐ यें व्ही क्लीं चन्द्रघंटाये नम: |
नवरात्र शब्द से 'नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध' होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है क्योंकि 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भारत के प्राचीन ऋषि-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि, रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। जैसे- नवदिन या शिवदिन। लेकिन हम ऐसा नहीं कहते।
नवरात्र के वैज्ञानिक महत्व को समझने से पहले हम नवरात्र को समझ लेते हैं। मनीषियों ने वर्ष में दो बार नवरात्रों का विधान बनाया है- विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक। इसी प्रकार इसके ठीक छह मास पश्चात् आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक नवरात्र मनाया जाता है। लेकिन, फिर भी सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना गया है। इन नवरात्रों में लोग
अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग-साधना आदि करते हैं। यहां तक कि कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है और जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।
हालांकि आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं बल्कि पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। यहां तक कि सामान्य भक्त ही नहीं अपितु, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते और ना ही कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। आज कल बहुत कम उपासक ही आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं।
जबकि मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। अब तो यह एक सर्वमान्य वैज्ञानिक तथ्य भी है कि रात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। हमारे ऋषि-मुनि आज से कितने ही हजारों-लाखों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे। आप अगर ध्यान दें तो पाएंगे कि अगर दिन में आवाज दी जाए, तो वह दूर तक नहीं जाती है, किंतु यदि रात्रि में आवाज दी जाए तो वह बहुत दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहल के अलावा एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें आवाज की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं।
रेडियो इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। आपने खुद भी महसूस किया होगा कि कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना मुश्किल होता है जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी आसानी से सुना जा सकता है। इसका वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं ठीक उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय रुकावट पड़ती है। इसीलिए ऋषि-मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा बहुत अधिक बताया है। मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर-दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है।
यही रात्रि का तर्कसंगत रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपनी शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं, उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि, उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।
वैज्ञानिक आधार-
नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह है कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां हैं जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तन-मन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है।
नवरात्र में नौ दिन या नौ रात को गिना जाना चाहिए?
अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। चूंकि यहां रात गिनते हैं इसलिए इसे नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है। रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और, इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है।
इन मुख्य इन्द्रियों में अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन, नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
हालांकि शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर 6 माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है जिसमें सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है, क्योंकि स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।
नवरात्रि हिन्दू धर्म के लोगो द्वारा मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार है। यह त्योहार असत्य पर सत्य की जीत को दर्शाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि साल में दो बार मनाया जाता है। हिंदी महीनों के मुताबिक पहला नवरात्रि चैत्र महीने में मनाया जाता है और दूसरी बार अश्विन महीने में मनाया जाता है। नवरात्रि नौ दिनों तक निरंतर चलता है जिसमे देवी मां के अलग अलग स्वरूपों की लोग भक्ति और निष्ठा के साथ पूजा करते है। भारत में नवरात्रि अलग अलग राज्यों में विभिन्न तरीकों और विधियों के संग मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर आती हैं। उनके आने की खुशी में इन दिनों को दुर्गा उत्सव के तौर पर देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है।
नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है नौ रातें। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान शक्ति- देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवां दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। चैत्र, आषाढ़, अश्विन, पौष प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों महालक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख को हटाने वाली होता है। इस त्योहार को पूरे भारत में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है।
नवरात्रि से हमें अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई के जीत की सीख मिलती है। यह हमें बताती है कि इंसान अपने अंदर की मूलभूत अच्छाइयों से नकारात्मकता पर विजय प्राप्त और स्वयं के अलौकिक स्वरूप से साक्षात्कार कैसे कर सकता है। भारतीय जनजीवन में धर्म की महत्ता अपरम्पार है। यह भारत की गंगा-जमुनी तहजीब का ही नतीजा है कि सब धर्मों को मानने वाले लोग अपने-अपने धर्म को मानते हुए इस देश में भाईचारे की भावना के साथ सदियों से एक साथ रहते चले आ रहे हैं। यही कारण है की पूरे विश्व में भारत की धर्म व संस्कृति सर्वोत्तम मानी गई है। विभिन्न धर्मों के साथ जुड़े कई पर्व भी है जिसे भारत के कोने कोने में श्रद्धा, भक्ति और धूमधाम से मनाया जाता है। उन्हीं में से एक है नवरात्रि।
नवरात्रि पर्व के नौ दिनों के दौरान आदिशक्ति जगदम्बा के नौ विभिन्न रूपों की आराधना की जाती है। ये नौ दिन वर्ष के सर्वाधिक पवित्र दिवस माने गए हैं। इन नो दिनों का भारतीय धर्म एवं दर्शन में ऐतिहासिक महत्व है और इन्हीं दिनों में बहुत सी दिव्य घटनाओं के घटने की जानकारी हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों में मिलती है। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है जो इस प्रकार हैं -शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चन्द्रघन्टा, कूष्माण्डा, स्कन्द माता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री।
वसन्त की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते हैं। त्योहार की तिथियां चन्द्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। यह पूजा वैदिक युग से पहले प्रागैतिहासिक काल से है। नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उनकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है।
नवरात्रि के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है, उसकि पूजा की जाती है। नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी की पूजा करने के लिए समर्पित है। आठवें दिन पर एक यज्ञ किया जाता है। नौवां दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन उन नौ बच्चियों की पूजा होती है। इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े, वस्तुयें, फल प्रदान किए जाते हैं। शक्ति उपासना का पर्व शारदीय नवरात्रि प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाई जा रही है। आदिशक्ति के हर रूप की नौ दिनों में क्रमशः अलग-अलग पूजा की जाती है। मां दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
इस पर्व से जुड़ी एक कथा अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा। महिषासुर ने अपने साम्राज्य का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा था तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की।
ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गई थीं। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततः महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं। नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
नवरात्रि के दौरान उपवास करने से शरीर से विषाक्त पदार्थ निकल जाते हैं, जिससे शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता है। नवरात्रि के दौरान ध्यान, योग और भक्ति करने से मन को शांति मिलती है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। नवरात्रि व्रत का मूल उद्देश्य है इंद्रियों का संयम और आध्यात्मिक शक्ति का संचय। वस्तुत: नवरात्र अंत:शुद्धि का महापर्व है। आज वातावरण में चारों तरफ विचारों का प्रदूषण है। ऐसी स्थिति में नवरात्र का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।(लेखक, रमेश सर्राफ धमोरा)
देवी उपासना के उल्लासधर्मा उत्सव चल रहे हैं। यह प्रकृति की आराधना है। प्रकृति मां है। हम सब इसी के अंश हैं, इसी में पलते हैं। प्रकृति गर्भ से अरबों जीव आ चुके। प्रतिपल आ रहे हैं। सतत अविरल। पुनर्नवा। फूल, फल वनस्पति, प्राणी। प्रश्न उठते हैं कि बार-बार क्यों होता है ऐसा सृजन? वैसी ही नन्ही चिड़िया, गाय का निर्दोष बछड़ा। निष्कलुष, अनासक्त, लोभ मुक्त शिशु। जीवन अद्वितीय है। मां का ही प्रसाद है। प्रकृति सृजनरत है। यह संभवतः कोई गीत रच रही है-अनंतकाल से। अपूर्ण गीत को फिर-फिर संशोधित करती है। छन्दबद्ध करती है। लय देती है। प्रकृति लालित्य रस से भरी-पूरी है। सृजन रहस्यपूर्ण है 'ऊधो कहि न जाय का कहिए/देखत अति विचित्र रचना यह समुझि मनै मन रहिए।' यह जीर्ण शीर्ण को निरस्त करती है बार-बार। फिर नूतन प्रवाह और बार-बार सृजन।
प्रकृति माता है। हम सबको सींचती है प्रतिपल। वनस्पतियां आकर्षित करती हैं। वे हमारी प्राण ऊर्जा की पूरक हैं। कीट पतंग विविध परिधान में घूमते हैं। प्रकृति दशों दिशाओं से अनुग्रह की वर्षा करती है। हमारा अनुगृहीत भाव स्वाभाविक है। यहां समूची प्रकृति के प्रति धन्यवाद भाव है। वह हमारी माता है। दिव्यता के कारण देवी है। जननी होने के कारण माता है। यह जीवन प्रकृति का ही उपहार है। प्रकृति का पोषण, संवर्द्धन मां की ही सेवा है। व्रत आदि आस्था के विषय हैं। मुख्य बात है-प्रकृति में मां देखने की अनुभूति। यह अनुभूति 'सर्वभूतेषु मातृरूपेण' प्रतीति है।
प्रकृति स्वयंभू है,सदा से है। सभी रूप प्रकृति के ही रूप हैं। प्रकृति को मां देखते ही हमारी जीवनदृष्टि बदल जाती है। हम अपनी सुविधा के लिए उन्हें अनेक नाम देते हैं। दुर्गा, काली, सरस्वती, शाकम्भरी, महामेधा, कल्याणी, वैष्णवी, पार्वती आदि आदि। नाम स्मरण आंतरिक बोध में भी सहायक हैं। मूलभाव है-मां। या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्ये, नमस्तस्ये नमो नमः। प्रकृति को दिव्य मां देखना अंधविश्वास का प्रश्न नहीं। प्रकृति अखण्ड इकाई है। इस अखण्ड इकाई का नाम क्या रखें? नाम रखते ही रूप का ध्यान आता है। रूप की सीमा है। प्रकृति अनंत है। असीम और अव्याख्येय। इसे मां कहने में आह्लाद है।
सम्प्रति भारत का मन भावप्रवण है। भावप्रवण चित्त में ही शिवसंकल्प उगते हैं। दुनिया का सारा सुन्दर भावप्रवण लोगों ने गढ़ा है। सुन्दर काव्य या सुन्दर ऊक्त-सूक्त। कला सहित सारे सृजन। प्रकृति प्रत्यक्ष भाव बोध में माता है। माता देवी है। देवी माता है। देवी उपासना मां और संतान के अविभाज्य और अनिवर्चनीय प्रेम का चरम है। दुर्गा सप्तशती में भी यही अनुभूति है। यह मां सर्वभूतेषु उपस्थित है। मां मां है। मां न स्त्री है और न पुरुष। वह देवी है, दिव्य है, देवता है। प्रणम्य है। मां उपासना वैदिक काल से भी प्राचीन है। ऋग्वेद में पृथ्वी माता हैं ही। इडा, सरस्वती और मही भी माता हैं, ये तीन देवियां कही गयी हैं-इडा, सरस्वती, मही तिस्रो देवीर्मयो भुव।' (1.13.9) एक मंत्र (3.4.8) में 'भारती को भारतीभिः कहकर बुलाया गया है-आ भारती भारतीभिः।' मां हरेक क्षण स्तुत्य है। दुख और विषाद में मां आश्वस्तिदायी है तो प्रसन्नता और आह्लाद में भी मां की उपस्थिति जरूरी है। इसलिए 'भारती' को नेह-न्योता है। भारतीभिः भरतजनों की इष्टदेवी हैं। ऋग्वेद में ऊषा भी देवी हैं। एक सूक्त (1.124) में 'ये ऊषा देवी नियम पालन करती हैं। नियमित रूप से आती हैं।' (वही मन्त्र 2) ऊषा, 'सबको प्रकाश आनंद देती हैं। अपने पराए का भेद नहीं करतीं।' (वही, 6) सबको समान दृष्टि से देखती हैं। ऋग्वेद में जागरण की महत्ता है। इसलिए 'सम्पूर्ण प्राणियों में सर्वप्रथम ऊषा ही जागती हैं।' (1.123.2) प्रार्थना है कि 'हमारी बुद्धि सत्कर्मों की ओर प्रेरित करे।' (वही, 6) ऊषा सतत् प्रवाह है। आती हैं, जाती हैं फिर फिर आती हैं। जैसी आज आई हैं, वैसे ही आगे भी आएंगी।' ऋग्वेद में मन की शासक देवी का नाम 'मनीषा' है। मनीषा और प्रज्ञा पर्यायवाची हैं। ऋषि आवाहन करते हैं 'प्र शुकैतु देवी मनीषा'। (7.34.1)
ऋग्वेद में श्रद्धा भी एक देवी हैं, 'श्रद्धा प्रातर्हवामहे, श्रद्धा मध्यंदिन परि, श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह नः'-हम प्रातःकाल श्रद्धा का आह्वान करते हैं, मध्यान्ह में श्रद्धा का आह्वान करते हैं, सूर्यास्त काल में श्रद्धा की ही उपासना करते हैं। हे श्रद्धा हम सबको श्रद्धा से परिपूर्ण करें। (10.151.5) श्रद्धा प्रकृति की विभूतियों में शिखर है-श्रद्धां भगस्तय मूर्धनि। (10.151.1) ऋग्वेद में जल को भी मां देखा गया है। वे 'जल माताएं' आपः मातरम् हैं और देवियां हैं। मां ही जन्म देती है। मां नहीं तो सृष्टि विकास नहीं। ऋग्वैदिक ऋषियों की अनुभूति में संसार के प्रत्येक तत्व को जन्म देने वाली यही आपः माताएं हैं-विश्वस्य स्थातुर्जगतो जनित्रीः (6.50.7) ऋग्वेद के बहुत बड़े देवता है अग्नि। इन्हें भी आपः माताओं ने जन्म दिया है: तमापो अग्निं जनयन्त मातरः (10.91.6) ऋग्वेद में वाणी की देवी वाग्देवी (10.125) हैं। वाणी की शक्ति अपरिमित है। वाग्देवी (ऋग्वेद वाक्सूक्त 10.125) कहती हैं-'मैं रूद्रगणों वसुगणों के साथ भ्रमण करती हूं। मित्र, वरुण, इन्द्र, अग्नि और अश्विनी कुमारों को धारण करती हूं। मेरा स्वरूप विभिन्न रूपों में विद्यमान है। श्रवण, मनन, दर्शन क्षमता का कारण मैं ही हूं। मैं समस्त लोकों की सर्जक हूं आदि। वे 'राष्ट्री संगमनी वसूनां-राष्ट्रवासियों और उनके सम्पूर्ण वैभव को संगठित करने वाली शक्ति-राष्ट्री है'। (10.125.3) हम सबने भारत को भी भारत माता जाना।
मां सर्वोत्तम अनुभूति है, प्रकृति की आदि अनादि अनुभूति। जीवन के हरेक स्पंदन में मां है। हम विराट का अंश है। मां भी विराट का अंश है। विराट अपने अंश हममें प्रकट करता है। मां को माध्यम बनाता है। हम 9 माह गर्भ में रहते हैं। मां की सांस हमारी सांस बनी रहती है। मां जागती रहती है, हम सो सकते हैं। वह सोई हो, तो भी हम जागते रह सकते हैं। गर्भ में हम ईर्ष्या राग द्वैष से मुक्त रहते हैं। भोजन, पानी और पोषण की चिन्ता से भी मुक्त। मां का गर्भ सर्वाेत्तम सुरक्षा, सर्वोत्तम आनंद आश्रय और विकास के अवसर देता है। हम गर्भ से बाहर आते हैं, संसार में। उस समय मां असह्य और दुर्निवार व्यथा में होती है लेकिन हमारे संभवन को संभव बनाती है। वह हमारे होने, विकसित होने और सक्षम होने में अपनी भूमिका निभाती है।
श्रीकृष्ण या श्रीराम को ईश्वर का अवतार कहा जाता है। वे भी मां के माध्यम से ही यहां आए। अस्तित्व को मां रूप में देखना आनंददायी है। हम पृथ्वी पुत्र हैं। पृथ्वी मां है। ऋग्वेद माता की गहन अनुभूति से भरापूरा है। ऋषि आनंद उल्लास और आश्वस्ति के हरेक प्रतीक में मां देखते हैं। पृथ्वी माता है। कहते हैं 'माता पृथ्वी धारक है। पर्वतों को धारण करती है, मेघों को प्रेरित करती है। वर्षा के जल से अपने अंतस् ओज से वनस्पतियां धारण करती है।' ऋग्वेद में रात्रि भी एक देवी हैं 'वे अविनाशी-अमत्र्या हैं, वे आकाश पुत्री हैं, पहले अंतरिक्ष को और बाद में निचले-ऊचे क्षेत्रों को आच्छादित करती है। उनके आगमन पर हम सब गौ, अश्वादि और पशु पक्षी भी विश्राम करते हैं।' (10.127) दुर्गा सप्तशती में निद्रा भी माता और देवी है। देवरूप मां की उपासना अतिप्राचीन है।
