प्रेरक प्रसंग अध्याय 3: भिक्षा का उपयोग | The Voice TV

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"जिन्दगी के लक्ष्य में प्राप्ती करते समय सिर्फ 2 सोच रखनी चाहिए, अगर रास्ता मिल गया तो ठीक, नहीं तो रास्ता में खुद बना लूँगा।"

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प्रेरक प्रसंग अध्याय 3: भिक्षा का उपयोग

Date : 17-Oct-2023

 स्वामी रामदासजी का यह नियम था कि वे स्नान एवं पूजा से निवृत्त्त हो भिक्षा माँगने के लिए केवल पाँच ही घर जाते थे और  कुछ कुछ लेकर ही वहाँ से लौटा करते |

 एक बार उन्होंने एक घर के द्वार पर खड़े होकरजय-जय  रघुवीर समर्थका घोष किया ही था कि गृहस्वामिनी, जिसकी थोड़ी ही देर पूर्व अपने पति से कुछ कहासुनी हुई थी और जो गुस्से में थी, बाहर आयी और चिल्लाकर बोली, तुम लोगों को भीख मांगने के अलावा कोई दूसरा धंधा ही नहीं | मुफ्त मिल जाता है, अतः चले आते हो | मेरे घर में तुम्हारी डाल गलेगी, जाओ कोई दूसरा घर ढूँढ़ों |’’

स्वामीजी हँसकर बोले, ‘माताजी ! मैं खाली  हाथ किसी द्वार में वापस नहीं जाया करता | कुछ कुछ तो लूँगा ही |’

वह गृहस्वामिनी भोजनोप्रान्त चौका लीप रही थी और उसके हाथ में लीपने का कपड़ा था | वह उसे ही उनकी झोली में डालते हुए बोली, ‘तो ले यह कपड़ा और कर अपना मुँह काला यहाँ

से |’

स्वामीजी प्रसन्न हो वहाँ से निकले और नदी पहुँचे | उन्होंने उस कपड़े को साफ किया और उसकी बत्तियां बनायीं तथा वे एक देवालय पहुँचे | इधर जब वे यह कपड़ा धो रहे थे, तो इधर उस स्त्री का हृदय भी पसीजने लगा और उसे पश्चाताप होने लगा कि उसने व्यर्थ ही एक सत्पुरुष का निरादर किया | उसे इतना रंज हुआ कि वह विक्षिप्त हो उन्हें खोजने के लिए दौड पड़ी | अंत में वह उस देवालय जा पहुँची | वह स्वामीजी के चरणों पर गिर पड़ी  और बोली, ‘देव! मैंने सरीखे धर्मात्मा का निरादर किया | मुझे क्षमा करें |’ और उसके नेत्रों में अश्रुधारा बह निकली |

रामदासजी बोले, ‘देवी! तुमने  उचित ही भिक्षा दी थी | तुम्हारी भिक्षा का ही प्रताप है कि यह देवालय प्रज्ज्वलित हो उठा है | अन्यथा तुम्हारा दिया हुआ भोजन तो जल्द ही खत्म हो गया होता |’ 


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