रायपुर, 01 अक्टूबर 2024 | छत्तीसगढ़ वन विभाग ने हाल ही में पारिस्थितिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण वन क्षेत्र की पहचान की है, जो दंतेवाड़ा वन मंडल के बचेली वन परिक्षेत्र में स्थित है और बीजापुर के गंगालूर वन परिक्षेत्र तक फैला हुआ है। इस विशेष वन क्षेत्र में कई प्राचीन वनस्पतियों की प्रजातियां पाई गयीं है, जो छत्तीसगढ़ राज्य की असाधारण जैव विविधता को प्रदर्शित करता है। इस क्षेत्र को वैज्ञानिकों और वन अधिकारियों ने जैव विविधता के लिए अत्यधिक समृद्ध और महत्वपूर्ण माना है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह खोज न केवल इस क्षेत्र के पर्यावरणीय महत्व को दर्शाती है, बल्कि भविष्य में वन अनुसंधान और संरक्षण के प्रयासों को भी नई दिशा देगी।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने इस क्षेत्र की जैव विविधता को संरक्षित करने और वन अनुसंधान को बढ़ावा देने पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि इस खोज से राज्य को पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक नई पहचान मिलेगी। सरकार इस क्षेत्र में शोध और अध्ययन के लिए विशेष प्रोत्साहन देगी, ताकि इन दुर्लभ प्रजातियों को संरक्षित रखा जा सके। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, यह दुर्लभ वन क्षेत्र विशेष रूप से उन पौधों की प्रजातियों का घर है, जो करोड़ों साल पहले के समय में अस्तित्व में थीं। अब यह क्षेत्र न केवल वैज्ञानिक अध्ययन के लिए बल्कि पर्यटन के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
समुद्र तल से 1,240 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित यह वन क्षेत्र सबट्रॉपिकल ब्रॉड-लीव्ड हिल फॉरेस्ट (फॉरेस्ट टाइप 8) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। खास बात ये है की यह छत्तीसगढ़ का सबसे ऊंचाई वाला वन क्षेत्र हो सकता है। जबकि राज्य में मुख्य रूप से मॉइस्ट एंड ड्राय डेसिड्युअस फॉरेस्ट्स (फॉरेस्ट टाइप 3 एंड 5) के लिए जाना जाता है, यह विशेष वन पैच ब्रॉड-लीव्ड हिल फॉरेस्ट एक नया पारिस्थितिक आयाम प्रस्तुत करता है।
यहां की वनस्पति पश्चिमी घाट की वनस्पतियों से काफी हद तक मेल खाती है। कांगेर घाटी के जंगलों की तरह, यह क्षेत्र भी विभिन्न प्रकार की प्रजातियों से समृद्ध है। इसके अलावा, मानवजनित दबाव की कमी होने कारण इन प्रजातियों को बिना किसी बाधा के पनपने में मदद मिली है। इस क्षेत्र को एक ’जीवित संग्रहालय’ माना जा रहा है, क्योंकि यहां कई प्राचीन पौधों की प्रजातियां संरक्षित हैं, जो संभवतः प्रागैतिहासिक काल, यहां तक कि डायनासोर युग से संबंधित हो सकती हैं। यहां पाई गई कुछ वनस्पतियों की प्रजातियों को छत्तीसगढ़ में पहली बार दर्ज किया गया माना जा रहा है।
इस विशेष वन का तीन दिवसीय सर्वे अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (विकास एवं योजना) श्री अरुण कुमार पांडे, आईएफएस के नेतृत्व में किया गया। इस सर्वे दल में पर्यावरणविदों और वन अधिकारियों के साथ-साथ आईएफएस परिवीक्षाधीन अधिकारी श्री एस. नवीन कुमार और श्री वेंकटेशा एम.जी. भी शामिल थे। इसके अलावा, वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के उप निदेशक डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्रा और पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज के पूर्व विभागाध्यक्ष श्री एम.एल. नायक भी सर्वे टीम का हिस्सा थे।
सर्वे के दौरान, टीम ने दुर्लभ और प्राचीन वनस्पतियों की कई प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया है, जिनमें ऐल्सोफिला स्पिनुलोसा (ट्री फर्न), ग्नेटम स्कैंडन्स, ज़िज़िफस रूगोसस, एंटाडा रहीडी, विभिन्न रुबस प्रजातियाँ, कैंथियम डाइकोकूम, ओक्ना ऑब्टुसाटा, विटेक्स ल्यूकोजाइलन, डिलेनिया पेंटागाइना, माचरेन्जा साइनेंसिस, और फिकस कॉर्डिफोलिया शामिल हैं। इनमें से माचरेन्जा साइनेंसिस प्रजाति संभवतः छत्तीसगढ़ के केवल इसी वनीय पहाड़ी क्षेत्र में पाई गई है।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख श्री व्ही. श्रीनिवास राव, आईएफएस ने इस विशेष वन क्षेत्र के बारे में कहा कि राज्य के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं वन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ वन विभाग राज्य की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण के लिए लगातार प्रयासरत रहा है। बचेली का ये बेहद विशेष वन क्षेत्र राज्य वन विभाग की जैव विविधता के संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
बचेली का ये विशेष वन भविष्य के अनुसंधान एवं इको-टूरिज्म के विकास के लिए महत्वपूर्ण संभावनाएं प्रस्तुत करता है। वन विभाग इस क्षेत्र की छिपी हुई जैव विविधता को और गहराई से समझने के लिए अधिक विस्तृत सर्वेक्षण करने की योजना बना रहा है।
देशभर के जनजातीय बहुल गांवों में निवास करने वाले जनजातीय परिवारों को समग्र विकास के साथ-साथ बेहतर सुविधाएं देने के लिए आगामी 2 अक्टूबर से एक बड़ा अभियान शुरू होने जा रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी झारखंड से प्रधानमंत्री जनजातीय उन्नत ग्राम अभियान (धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान) की शुरूआत करने जा रहे हैं। अभियान के तहत गांव में बुनियादी ढांचे में सुधार, आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ्य के मानकों को भी शामिल किया गया है। यह योजना देश के 63 हजार जनजातीय बहुल गांवों में चलाई जाएगी।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हाल में ही आयोजित केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में देश के जनजातीय बहुल गांवों और आकांक्षी जिलों में जनजातीय परिवारों के लिए परिपूर्णता लक्ष्य को अपनाकर जनजातीय समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार हेतु प्रधानमंत्री जनजातीय उन्नत ग्राम अभियान को मंजूरी दी गई है। इस मिशन में 79,156 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा गया है। यह योजना केन्द्र और राज्य सरकार के सहयोग से क्रियान्वित की जा रही है।
छत्तीसगढ़ में लगभग 32 प्रतिशत जनजातीय जनसंख्या निवास करती है। इस अभियान के क्रियान्वयन के लिए 32 जिलों के 138 विकासखण्डो के 6691 आदिवासी बहुल गांव का चयन किया गया है। चयनित गांव में बुनियादी सुविधाओं के विकास के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, उन्नति के कार्य किए जाएंगे। जनजातीय बहुल इलाकों को देश की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए चलाए जा रहे इस महत्वाकांक्षी मिशन के क्रियान्वयन के लिए छत्तीसगढ़ में संबंधित विभागों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए हैं।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी 02 अक्टूबर को झारखण्ड़ के हजारीबाग में आयोजित समारोह में इस योजना का शुभारंभ करेंगे। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले की लखपति दीदी मानकुंवर बाई और परिवारजन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से कार्यक्रम में मुलाकात करेंगी। श्री मोदी बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के राजपुर में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यक्रम को वर्चुअली सम्बोधित करेंगे। इस मौके पर राजपुर में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय सहित अन्य अतिथिगण शामिल होंगे।
प्रधानमंत्री जनजातीय उन्नत ग्राम अभियान का उद्देश्य भारत सरकार की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सामाजिक बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका में महत्वपूर्ण अंतराल को भरना और पीएम जनमन की सीख और सफलता के आधार पर जनजातीय क्षेत्रों एवं समुदायों का समग्र और सतत विकास सुनिश्चित करना है।
केन्द्रीय बजट में की गई घोषणा के अनुसार देश में आदिवासी बहुल क्षेत्रों के 63,000 गांव शामिल होंगे, जिससे 5 करोड़ से अधिक जनजातीय लोगों को लाभ होगा। इसमें 30 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों के जनजातीय बहुल 549 जिले और 2,740 ब्लॉक के गांव शामिल होंगे। इस मिशन में 25 कार्यक्रम शामिल हैं, जिन्हें 17 मंत्रालयों द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा। प्रत्येक मंत्रालय-विभाग अनुसूचित जनजातियों के लिए विकास कार्य योजना के तहत उन्हें आवंटित धनराशि के माध्यम से अगले 5 वर्षों में समयबद्ध तरीके से योजना का क्रियान्वयन करेंगे।
बुनियादी ढांचे का विकास
मिशन के तहत पात्र अनुसूचित जनजाति परिवारों को पीएमएवाई (ग्रामीण) के तहत नल के पानी और बिजली आपूर्ति की उपलब्धता के साथ पक्के आवास मिलेंगे। इन परिवारों को आयुष्मान भारत कार्ड से भी जोड़ा जाएगा। जनजाति बहुल गांवों के लिए सभी मौसम में बेहतर सड़क संपर्क के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़कों का निर्माण कराया जाएगा। भारत नेट परियोजना के अंतर्गत मोबाइल कनेक्टिविटी और इंटरनेट की सुविधा पहुचाई जाएगी। स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा में सुधार के लिए बुनियादी ढांचा सुनिश्चित किया जाएगा।
आर्थिक सशक्तिकरण
जनजाति समुदाय के छात्र-छात्राओं को हर साल 10वीं-12वीं कक्षा के बाद दीर्घकालिक कौशल पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण की व्यवस्था, इसके अलावा, जनजातीय बहुउद्देशीय विपणन केंद्र के माध्यम से विपणन सहायता, पर्यटक गृह प्रवास, एफआरए पट्टा धारकों को कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन के लिए सहायता प्रदान की जाएगी।
शिक्षा और स्वास्थ्य
स्कूल और उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को राष्ट्रीय स्तर तक बढ़ाना और जिला, ब्लॉक स्तर पर स्कूलों में जनजातीय छात्रावासों की स्थापना करके जनजातीय छात्रों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को मिशन के तहत सुलभ बनाया जाएगा। जनजातीय परिवारों की गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करना, शिशु मृत्यु दर, मातृत्व मृत्यु दर में राष्ट्रीय मानकों को हासिल करना और उन स्थानों, जहां स्वास्थ्य उपकेंद्र मैदानी क्षेत्रों में 10 किमी से अधिक और पहाड़ी क्षेत्रों में 5 किमी से अधिक दूरी पर है, वहां मोबाइल मेडिकल यूनिट के माध्यम से टीकाकरण की सुविधा दी जाएगी।
जिस प्रकार एक सम्पूर्ण पेड़ के विकाश में जड़ का विशेष महत्त्व होता है | जड़ से ही तना, डाली और पत्तियां लहराकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करती है | उसी प्रकार बुजुर्ग या परिवार का मुखिया वह जड़ है जिनके छत्रछाव में पूरा परिवार बढ़ता है प्रफुल्ल्ति होता है | वृद्धजनों के लिए प्रतिबद्धता को ध्यान में रखते हुए हर वर्ष 1 अक्टूबर कोअंतर्राष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस मनाया जाता है |
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने भारत में वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण को बढ़ावा देने में निरंतर रूप से अग्रणी भूमिका निभाई है।
इसका उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना और जनता, नागरिक समाज एवं अन्य सरकारी निकायों की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करना है। इसका उद्देश्य अंतर-पीढ़ीगत बंधन के महत्व पर जोर देने के साथ-साथ वरिष्ठ नागरिकों के अमूल्य योगदान को पहचानना और उनके कल्याण के संदर्भ में जागरूकता बढ़ाना भी है।
इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस 2024 का विषय है “सम्मान के साथ वृद्धावस्था: दुनिया भर में वृद्ध व्यक्तियों के लिए देखभाल और सहायता प्रणालियों को मजबूत करने का महत्व।”
अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस का इतिहास: भारत मैड्रिड, स्पेन में आयोजित द्वितीय संयुक्त राष्ट्र महासभा की राजनीतिक घोषणा और मैड्रिड इंटरनेशनल प्लान ऑफ एक्शन ऑन एजिंग (2002) का हस्ताक्षरकर्ता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 14 अक्टूबर 1990 के दिन 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस के रूप में नामित किया था। महासभा ने 1982 की अंतरराष्ट्रीय वृद्धावस्था कार्य योजना के आधार पर वृद्ध व्यक्तियों के लिए संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों को अपनाया। इसमें चार सिद्धांत- स्वतंत्रता, भागीदारी, देखभाल, आत्म-पूर्ति और गरिमा शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र के दशक 2021-30 को स्वस्थ वृद्धावस्था का दशक भी घोषित किया गया है और इसे बेहतर स्वास्थ्य और कल्याण के एसडीजी (3) लक्ष्य के साथ संरेखित किया गया है।
भारत ने मैड्रिड योजना से काफी पहले 1999 में राष्ट्रीय वृद्धजन नीति (एनपीओपी) तैयार की थी।केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार एक अक्टूबर को नई दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस-2024 समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में अध्यक्षता करेंगे। इस अवसर पर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री बी.एल. वर्मा मुख्य अतिथि होंगे।
भारत में वरिष्ठ नागरिकों के लिए राष्ट्रीय नीति
यह नीति वरिष्ठ नागरिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आश्रय और आय सृजन के अवसर प्रदान करने पर केंद्रित है। यह बुजुर्गों की सहायता करने में परिवार की देखभाल और समुदाय की भागीदारी के महत्व पर भी जोर देती है।
भारत में वृद्ध व्यक्तियों के जीवन को बेहतर बनाने और उन्हें पर्याप्त सहायता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कई योजनाएँ हैं। भारत में वृद्ध व्यक्तियों से संबंधित कुछ प्रमुख योजनाएँ इस प्रकार हैं:
वृद्ध व्यक्तियों पर राष्ट्रीय नीति (एनपीओपी), 1999 :- इसका उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों की वित्तीय सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, आश्रय और कल्याण के लिए राज्य सहायता प्रदान करना है।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (IGNOAPS):- गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले बुजुर्ग नागरिकों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
राष्ट्रीय वयोश्री योजना (आरवीवाई):- आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के वरिष्ठ नागरिकों को शारीरिक सहायता और सहायक उपकरण वितरित करता है।
प्रधानमंत्री वय वंदना योजना (पीएमवीवीवाई):- वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक पेंशन योजना जो 10 वर्ष की परिपक्वता अवधि के साथ उनके निवेश पर सुनिश्चित रिटर्न प्रदान करती है।
वृद्धजनों के लिए एकीकृत कार्यक्रम (आईपीओपी):- वरिष्ठ नागरिकों के लिए गृह, डेकेयर सेंटर और मोबाइल स्वास्थ्य देखभाल इकाइयां चलाने के लिए गैर सरकारी संगठनों को अनुदान प्रदान करता है।
वरिष्ठ पेंशन बीमा योजना:- वरिष्ठ नागरिकों के लिए खरीद मूल्य पर गारंटीकृत रिटर्न के आधार पर सुनिश्चित पेंशन प्रदान करता है।
वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (एससीएसएस):- नियमित ब्याज भुगतान वाली सरकार समर्थित बचत योजना, जो विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिकों के लिए बनाई गई है।
संशोधित नीति में वित्तीय सुरक्षा में सुधार, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और समाज में वृद्ध व्यक्तियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के उपाय करने का आह्वान किया गया है। यह समावेशी नीतियों के माध्यम से वरिष्ठ नागरिकों की भलाई को बढ़ावा देती है जो उनकी गरिमा और अधिकारों की रक्षा करती हैं।
गांधीजी का जन्म उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ था, आधी बीसवीं सदी तक के दौरान वे भारतीय समाज और राजनीति की धुरी बन गए और अब इक्कीसवीं सदी में हम सब उनके मिथक से रूबरू हो रहे हैं। विश्वव्यापी अंग्रेजी साम्राज्य से अहिंसक लड़ाई के साथ उनका स्वाधीन भारत का स्वप्न सत्य हुआ। देश में रचनात्मक बदलाव के लिए वे सबको साथ ले कर चलते रहे। उनकी स्वीकार्यता का दायरा आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक यानी जीवन के सभी क्षेत्रों में निरंतर बढ़ता गया। संयम और आत्म-बल के साथ कर्मवीर गांधी ने जो ठाना उसे पूरा करने के लिए सर्वस्व लगा दिया। समाज के स्तर पर मानव कर्तृत्व की विरल गाथा बना उनका निजी जीवन पीड़ा, संघर्ष और अनिश्चय से भरा था। देश के लिए समर्पण की मिसाल बने गांधीजी अंतिम जन की मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए की मोर्चों पर डटे रहे। वे देश के विभाजन और आजादी के साथ शुरू हुई हिंसा से क्षुब्ध और दुखी थे। बंगाल में नोआखाली से लौट दिल्ली में दंगापीड़ितों की सेवा सुश्रूशा में जुट गए।
विभाजन की विभीषिका बड़ी दारुण थी और विचलित तथा हताश गांधीजी ने स्वतंत्र भारत में अपने पहले जन्मदिन यानी 2 अक्टूबर 1947 को दुखी हो कर कहा था कि वे अब जीना नहीं चाहते और विधि का विधान यह हुआ कि वह सचमुच उनका आखिरी जन्मदिन सिद्ध हुआ। पांच बार की असफल कोशिशों के बाद 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस में उनकी हत्या हो गई। गौरतलब है कि गांधीजी स्वतंत्र भारत में करीब पांच महीने जीवित रहे थे और इस बीच यह बूढ़ा सेनानी स्वप्न-भंग से गुज़र रहा था। अब कोई उनकी सुन नहीं रहा था। ये दिन उनके लिए बड़े तकलीफ़देह थे।
गांधीजी ने अपने जीवन की कथा को पारदर्शी बनाए रखा। ‘सत्य’ और ‘नैतिकता’ से जूझती इस कथा को उन्होंने ‘एक खुली किताब’ कहा। उनका साहस ही था कि वह कह सके कि ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।’ प्रिय-अप्रिय, अच्छे-बुरे हर पहलू को वह सबसे साझा किए। वे सही अर्थों में सत्य के पुजारी थे और जो भी है वह सत्य है इसलिए उसे झूठ के सहारे छिपाना अपराध ही होता। सत्य पर उनका भरोसा बढ़ता गया और वे कथनी और करनी में एका लाने में लागातार जुटे रहे। तभी वह पहनावा, खानपान और मेलमिलाप आदि सब में सरल भारतीय जीवन शैली को अपना सके। वे प्रामाणिकता की कसौटी पर खरे उतरते रहे। विचार को कर्म में तब्दील करने पर जोर देने वाले गांधीजी परिवर्तन चाहने वाले को खुद अपने में बदलाव लाने के लिए कहते हैं। यह खुद उनकी अपनी जिन्दगी की सीख थी। बहुत हद तक प्रयासपूर्वक संयमित जीवन जीते हुए वह जगत की नियमबद्धता में प्रकट हो रहे परमात्मा में आस्था और विश्वास रखते थे। चूँकि नज़रिए स्वाभाविक रूप से भिन्न होते हैं विविधता सहज संभाव्य होती है। गैर-जानकारी में लोग अपने से अलग दूसरी दृष्टियों को ग़लत या हीन ठहराने लगते हैं। गांधीजी अपनी प्रार्थंना सभा में सभी प्रमुख धर्मों की प्रार्थनाओं को शामिल करते थे। वे मानते थे सभी एक ही तत्व से बने हैं इसलिए कोई अछूत नहीं और किसी का भी स्वामित्व नहीं। सभी ट्रस्टी हैं इसलिए (अपना हक़ न जमाते हुए) त्यागपूर्वक भोग करना चाहिए। गांधीजी धैर्य और दृढ़ता के साथ सत्य (ईश्वर), अहिंसा (प्रेम) और अपरिग्रह (जरूरत भर संग्रह) जैसे विचारों को अमली जामा पहनाते रहे और दैनन्दिन जीवन में शामिल करते रहे। इस दृष्टि से उनकी उर्वर मानसिकता और सृजनशीलता असंदिग्ध है।
भारत और विदेश में हो रहे अनुभवों को समेटते और पचाते हुए गांधीजी खुले मन से मानवीय चेतना के आत्म-बोध को रचते रहे। वे कई अर्थों में समकालीनों से अलग हट कर गांधीजी ने अपना रास्ता बनाया और उस पर चलने की तैयारी की थी और जोखिम उठाकर भी उस पर चलते रहे। गांधीजी देश के लम्बे स्वतंत्रता-संग्राम में दो दशकों तक केंद्र-बिन्दु रहे। इसके पहले दाक्षिण अफ़्रीका में के दो दशक की अवधि में सामाजिक–राजनैतिक कार्यकलाप में बीती थी जिनमें नस्लवाद और साम्राज्यवाद का तीव्र विरोध शामिल था। वे भारतीय समुदाय के साथ काम करते हुए संघर्ष की शक्ति को जाना पहचाना। आत्मविश्वास से भरे गांधीजी ने अखबार निकालने के साथ सामाजिक चेतना के लिए प्रयास किए। उनका निजी अध्यवसाय भी चलता रहा और मानव स्वभाव की गहनता को समझते रहे। 1915 में भारत लौटने पर वे एक सजग-सशक्त सत्याग्रही और नेतृत्व के लिए प्रस्तुत थे। स्थानीयता पर जोर देते हुए वैश्विक मानव-बोध के पक्षधर गांधी जी अपनी सभ्यता की खूबियों के साथ उसकी कमियों को भी स्वीकार करते हैं। वे स्वदेश, स्वभाषा और स्वराज के ख़ास तौर पर हिमायती हैं। वे ऐसे स्वराज की कल्पना करते हैं जिसमें समाज के अंतिम जन की आवाज भी मायने रखती है।
गांधीजी के सपनों के भारत में यहाँ का पूरा लोक-जीवन समाया था। उनकी सोच में एक विकेन्द्रीकृत सत्ता संरचना वाला भारत था। वे गावों को समर्थ और समृद्ध बनाने के लिए चिंतित थे। इसलिए वे स्थानीय स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और आर्थिक जीवन को सशक्त बनाने के पक्षधर थे। वे एक आदर्शवादी व्यावहारिक देश-सेवक की हैसियत से एक सर्वसमावेशी व्यवस्था को विकल्प के रूप में आगे बढ़ा रहे थे। गांधी होने का वास्तविक अर्थ आचरण और विचार का एक गतिशील पुंज है जो आज भी अंधेरे में दीपक की भाँति रोशनी बिखेरता है ।
लेखक गिरीश्वर मिश्र
(महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
युधिष्ठिर बोले, सुनो द्रोपदी! मैं भगवान् का भजन सौदे के लिए नहीं किया करता | मैं भजन करता हूँ केवल इसलिए कि भजन करने से आनंद प्राप्त होता है | सामने फैली हुई उस पर्वतमाला को देखो, उसे देखते ही मन प्रफुल्ल्ति हो जाता है | हम उससे कुछ मांगते नहीं | हम इसलिए देखते हैं कि देखने में प्रसन्नता होती है | इसी प्रसन्नता के लिए मैं भगवान् का भजन करता हूँ |
