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1 अक्टूबर:- विश्व वृद्धजन दिवस
Date : 01-Oct-2024
एक ओर मानवीय विकास चन्द्रमा के पार पहुँच गया है । समृद्धि और साधनों का भी अंबार लग रहा है । पर इसके साथ एक बड़ी समस्या उन लोगों के सामने आ रही है जिन्होंने आसमान की ऊँचाइयों तक उड़ने की नींव रखी थी वर्तमान की इस पीढ़ी को उंगली पकड़कर आगे बढ़ना सिखाया था । जिस पीढ़ी ने रात दिन परिश्रम करके अपनी आने वाली संतानों केलिये स्वर्णिम भविष्य की इबारत लिखी थी, वह पीढ़ी अब अंपेक्षित और, असहाय हो रही है । समय के साथ शरीर थकता है, आय घटती है, बीमारियाँ बढ़तीं हैं। और अपनी बात कहने, सुनने, और हँसने बोलने की इच्छा होती है । तब लगता है कोई पास हो । जब इस पीढ़ी को सहयोग और साथ की सर्वाधिक आवश्यकता थी तब असहाय हो रही है । समय की तेज रफ्तार से आगे बढ़ता समाज अपने ही बुजुर्गों से कन्नी काटने लगा है । यह समस्या किसी एक देश की नहीं पूरे विश्व की है । इससे वह भारत भी अछूता नहीं रहा जहाँ कुटुम्ब परंपरा रही है । ऋग्वेद से लेकर सभी ग्रंथों में पितरों केलिये प्रार्थना है । एक ओर पूरी दुनियाँ के समाज शास्त्री भारत कुटुम्ब परंपरा पर शोध करके वृद्ध जनों के सम्मान का सूत्र ढूँढ रहे हैं, लेकिन अब भारत में भी संस्कृति के ह्रास के कारण बुज़ुर्ग पीढ़ी अब वृद्धाश्रमों में अपना भविष्य ढूंढ रही है। एक ओर पूरे विश्व में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है तो दूसरी ओर उनकी उपेक्षा भी । 2006 के आकड़ों के अनुसार विश्व में वृद्ध जनों की संख्या 11% थी जो 2016 में बढ़कर 14% हो गई। अनुमान है 2050 तक यह अनुपात 22% हो जायेगा । यह भी अनुमान है कि 2030 तक वैश्विक स्तर पर वृद्ध व्यक्तियों की संख्या युवाओं से अधिक हो जाएगी, और यह वृद्धि विकासशील देशों में सबसे तेज़ होगी। इस परिदृश्य ने आने वाले समय के लिये अनेक प्रकार की चुनौतियों का संकेत दे दिया है । यदि समाज में चेतना नहीं आई तो स्थिति भयावह होगी । इस स्थिति पर 1982 से राष्ट्र संघ ने विश्व स्तर पर अध्ययन आरंभ किया । दुनियाँ भर के वृद्धजनों के सामने मुख्य रूप से छै प्रकार की समस्याएँ देखीं गईं। इनमें आयु बढ़ने के साथ शारीरिक रूप से दुर्बलता आना । ऊर्जा घटने और शारीरिक रोगों का कारण अतिरिक्त देखभाल की जरूरत पड़ती है । दूसरी समस्या मानसिक रोगों की है । शरीरिक क्षीणता के कारण जब शारीरिक रोग होने पर उचित देखभाल न हो तो मानसिक हीनता उत्पन्न होती है । यह मानसिक हीनता अनेक मानसिक रोगों को जन्म देती है । तीसरी समस्या अकेलेपन की होती है । वृद्धजन चाहते हैं कि कोई उनके पास बैठें जिससे वे अपने जीवन के अनुभव साँझा कर सकें । चौथी समस्याआर्थिक असुरक्षा की होती है । आय घटती है और बढ़ते रोगों के कारण व्यय बढ़ता है । तो आर्थिक असुरक्षा का भाव उत्पन्न होता है । पाँचवी समस्या संयुक्त परिवार के अभाव की होती है । बच्चे अपने केरियर के लिये घर से दूर पढ़ते हैं, जाॅव करते हैं तो उन्हे अपने बुजुर्गों से लगाव नहीं रहता । इसलिये वृद्धजनों को जब सबसे अधिक आवश्यकता होती है तब वे अकेले रह जाते हैं। और छठी समस्या सामूहिकता और मनोरंजन की समस्या भी देखी गई है । बुजुर्गों का भी मन होता है हँसने बोलने और घूमने फिरने का । पर समय के साथ वे अकेले हो जाते हैं। अनेक तो ऐसे उनके सामने रहने और, खाने तक की समस्या उत्पन्न हो जाती है ।
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