मकर संक्रांति पर ‘डूंचकी’ ने भरी आजादी की उड़ान | The Voice TV

Quote :

"जिन्दगी के लक्ष्य में प्राप्ती करते समय सिर्फ 2 सोच रखनी चाहिए, अगर रास्ता मिल गया तो ठीक, नहीं तो रास्ता में खुद बना लूँगा।"

National

मकर संक्रांति पर ‘डूंचकी’ ने भरी आजादी की उड़ान

Date : 14-Jan-2026

 उदयपुर, 14 जनवरी । उदयपुर संभाग के आदिवासी अंचल में मकर संक्रांति की सुबह एक अनूठी परंपरा के साथ शुरू हुई। सूरज निकलते ही बच्चों की टोलियां हाथों में नन्हीं चिड़ियाओं डूंचकियां लिए घर-घर निकल पड़ीं। गलियों में गूंजती रही टेर “खीचड़ो आलो के, डूंचकी मारूं”।

इस टेर को सुनकर घरों से महिलाएं बाहर आईं और बच्चों को खीचड़ा दिया। खीचड़ा मिलते ही बच्चे एक-एक कर डूंचकी को आज़ाद करते गए। यह दृश्य सिर्फ उत्सव का नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का भी प्रतीक था। दरअसल, दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में मकर संक्रांति पर निभाई जाने वाली यह परंपरा दान और भोजन तक सीमित नहीं है। डूंचकी एक नन्हीं चिड़िया को आदिवासी स्थानीय भाषा में यही नाम दिया गया है। बच्चे मकर संक्रांति से पहले इन चिड़ियों को सहेज कर रखते हैं और पर्व के दिन उन्हें सम्मान के साथ मुक्त करते हैं।

यह परंपरा चराचर जीव-जगत की रक्षा का संदेश देती है। आदिवासी समाज मानता है कि पक्षियों की रक्षा केवल उन्हें बचाने से नहीं होती, बल्कि उनके घरों, पेड़ों और जंगलों को सुरक्षित रखने से भी होती है। इसी सोच के साथ मकर संक्रांति को पर्यावरण संरक्षण के संकल्प के पर्व के रूप में मनाया जाता है। डूंचकी की यह सामूहिक मुक्ति दरअसल आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाने का अवसर है कि प्रकृति, पक्षी और पर्यावरण के बिना मानव जीवन की कल्पना अधूरी है।


RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement