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फणीश्वर नाथ रेणु : ग्रामीण भारत की आत्मा को शब्द देने वाला साहित्यकार

Date : 11-Apr-2025

हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ रचनाकार ऐसे हुए हैं, जिन्होंने न केवल शब्दों से कहानियाँ गढ़ी, बल्कि शब्दों के ज़रिए पूरे समाज, उसकी साँस्कृतिक धड़कनों और जीवनशैली को जीवंत कर दिया। ऐसे ही एक विशिष्ट साहित्यकार थे फणीश्वर नाथ रेणु, जिन्होंने आंचलिकता को हिंदी साहित्य में नई पहचान दिलाई। वे न केवल एक संवेदनशील रचनाकार थे, बल्कि एक सजग स्वतंत्रता सेनानी, जन-आंदोलन के सहयोगी और आम जनजीवन के वास्तविक प्रतिनिधि भी थे।

जन्म, बचपन और शिक्षा

फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया ज़िले के औराही हिंगना गाँव में हुआ था। उनके पिता शीलनाथ मंडल स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी कार्यकर्ता थे, जिनसे उन्हें देशभक्ति और सामाजिक चेतना की प्रेरणा मिली। उनका बचपन एक ऐसे वातावरण में बीता जहाँ स्वतंत्रता की ललक और सामाजिक बदलाव की ज्वाला हर ओर थी।

प्रारंभिक शिक्षा अररिया हाई स्कूल में हुई, लेकिन पहली बार मैट्रिक परीक्षा में वे सफल नहीं हो सके। बाद में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से मैट्रिक उत्तीर्ण किया। इंटरमीडिएट की पढ़ाई शुरू की, परंतु व्यक्तिगत कारणों से पूरी नहीं हो सकी। हालांकि औपचारिक शिक्षा सीमित रही, पर जीवन के अनुभवों और गहरे सामाजिक सरोकारों ने उन्हें एक कालजयी लेखक बना दिया।

क्रांतिकारी सोच और स्वतंत्रता आंदोलन

रेणु सिर्फ साहित्य के सृजनकर्ता नहीं थे, बल्कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण वे दो वर्षों तक जेल में रहे। यही नहीं, उन्होंने नेपाल की राजशाही के खिलाफ हुए जन आंदोलन में भी भाग लिया और वहाँ की क्रांति में भागीदारी निभाई। उनके लेखन में यही प्रतिरोध और बदलाव की चेतना गहराई से मौजूद रहती है।

साहित्यिक योगदान और आंचलिकता की धारा

रेणु का साहित्यिक सफर 1936 में शुरू हुआ, लेकिन उन्हें व्यापक ख्याति 1954 में प्रकाशित उनके पहले उपन्यास मैला आँचल से मिली। यह उपन्यास हिंदी साहित्य में आंचलिकता की परंपरा की नींव बना। उन्होंने बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र की बोली, संस्कृति, जीवन-शैली और संवेदनाओं को इतनी प्रामाणिकता से चित्रित किया कि वह पाठकों को उनके गाँव का हिस्सा बना देता है।

उनकी भाषा शैली में लोकबोली की मिठास, पात्रों का जीवन्त चित्रण और सामाजिक यथार्थ की तीव्रता है। वे मानते थे कि साहित्य को केवल शहरी और अभिजात्य वर्ग तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें गाँव, किसान, मज़दूर और आम जन की उपस्थिति भी ज़रूरी है।

प्रमुख कृतियाँ

फणीश्वर नाथ रेणु ने उपन्यास, कहानियाँ और रिपोर्ताज जैसी विधाओं में लेखन किया। उनके प्रमुख उपन्यास हैं:

  • मैला आँचल

  • परती परिकथा

  • कितने चौराहे

  • कलंक मुक्ति

  • पल्टू बाबू रोड

उनके कहानी संग्रहों में — ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, और अच्छे आदमी प्रमुख हैं।

उनकी कुछ लोकप्रिय कहानियाँ जैसे — पंचलाइट, मारे गए गुलफाम, लाल पान की बेगम, और पहलवान की ढोलक आज भी पाठकों के बीच बेहद चर्चित हैं और स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में भी शामिल हैं।

सिनेमा और जनमानस तक पहुँच

रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम पर आधारित फिल्म तीसरी कसम (राज कपूर और वहीदा रहमान अभिनीत) न सिर्फ एक सिनेमाई कृति बनी, बल्कि उनके साहित्य को आम जन तक पहुँचाने का माध्यम भी बनी। इस फिल्म के माध्यम से रेणु की कहानियों का प्रभाव साहित्यिक जगत से निकलकर सिनेमा प्रेमियों तक पहुँच गया।

राजनीति और समाज सेवा

साहित्य और क्रांति से जुड़े रहने के साथ-साथ रेणु राजनीति से भी जुड़े। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से प्रेरणा लेकर उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी से जुड़कर 1972 में बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ा। हालाँकि चुनाव में जीत नहीं मिली, परंतु उन्होंने सक्रिय राजनीति से अलग होकर पुनः साहित्य सृजन की ओर रुख किया।

सम्मान और उपलब्धियाँ

फणीश्वर नाथ रेणु को 1970 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा गया। यह सम्मान न केवल उनके साहित्यिक योगदान की मान्यता थी, बल्कि उस ग्रामीण भारत को भी सम्मानित करने जैसा था, जिसकी आवाज़ उन्होंने पूरे देश को सुनाई।

निधन और साहित्यिक विरासत

11 अप्रैल 1977 को पटना में उनका निधन हुआ। लेकिन वे अपनी रचनाओं, विचारों और लेखन-शैली के ज़रिए आज भी जीवित हैं। उनकी रचनाओं में जो लोकजीवन की धड़कन है, वह आज भी पाठकों को बाँधती है। उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नई दृष्टि, नई भाषा और नया भावबोध दिया।

फणीश्वर नाथ रेणु सिर्फ लेखक नहीं थे — वे एक आंदोलन थे, जिन्होंने साहित्य में गाँव को, किसान को, आम जन को केंद्र में रखा। उन्होंने साहित्य को elitist दृष्टिकोण से बाहर निकालकर उसे ज़मीन से जोड़ा। उनकी भाषा, पात्र, कथानक — सब में भारतीयता रची-बसी है।

उनकी लेखनी आज भी हमें यही याद दिलाती है कि “गाँव सिर्फ एक भूगोल नहीं, एक जीवंत संस्कृति है” — और फणीश्वर नाथ रेणु उसी संस्कृति के सबसे संवेदनशील कथाकार थे।

 


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