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अमेरिकन टैरिफ नीति में भारत को मिलता लाभ

Date : 07-Apr-2025


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लागू किए गए नए 'पारस्परिक टैरिफ' (Reciprocal Tax) का दुनिया की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ना सुनिश्‍चित है। लेकिन इस टैरिफ के बारे में भारत को लेकर जितनी चिंता जताई जा रही है, वास्‍तव में उतनी चिंता कम से कम भारत के लिए तो नहीं है। इसे अब आप राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति झुकाव मान सकते हैं या अमेरिकन अर्थव्‍यवस्‍था को गति प्रदान कर रहे प्रवासी भारतीयों के प्रति अमेरिका की वर्तमान सरकार का सकारात्‍मक दृष्टिकोण, जो भी हो; इसमें कुल मिलाकर भारत का हित प्रभावित होता हुआ नहीं दिखता, बल्‍कि इसके उलट भारत के लिए अनेक क्षेत्रों में इस टैरिफ नीति ने नए अवसर अवश्‍य खोल दिए हैं।

देखा जाए तो अमेरिका के टैरिफ वार से 60 से अधिक देश प्रभावित हो रहे हैं। चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा काफी अधिक है। इसलिए चीन पर उसने सबसे अधिक टैरिफ लगाया है। अमेरिका में सभी चीनी आयातों पर 54 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की है। वस्‍तुत: ट्रंप की घोषणा से अमेरिका में चीन से आयातित सभी वस्तुओं पर मौजूदा 20 प्रतिशत टैरिफ में 34 प्रतिशत तथाकथित "रेसिप्रोकल टैरिफ" जुड़ गया है। अमेरिका ने कंबोडियाई वस्तुओं पर 49 प्रतिशत, वियतनाम पर 46 प्रतिशत, श्रीलंका पर 44 प्रतिशत, बांग्लादेश पर 37 प्रतिशत, स्विट्जरलैंड पर 31 प्रतिशत, दक्षिणी अफ्रीका पर 30 प्रतिशत, थाईलैंड पर 36 प्रतिशत, इंडोनेशिया और ताईवान पर 32 प्रतिशत, पाकिस्तान पर 29, भारत पर 26 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया पर 25 प्रतिशत, मलेशिया पर 24 प्रतिशत से लेकर अन्‍य देशों पर न्‍यूनतम 10 प्रतिशत की दर से टैरिफ लगाया है। इसके साथ ही कई उत्‍पाद ऐसे भी हैं, जिन्‍हें अमेरिका ने अपनी नई टैरिफ नीति से दूर रखा है और पूरा लाभ कमाने का अवसर कई देशों के लिए खुला छोड़ दिया है।

जिन वस्‍तुओं पर टैरिफ का असर पड़ भी रहा है, तो वह इसलिए कि उनकी मांग अमेरिका में ज्‍यादा है, जिसकी कि अधिकांश पूर्ति अभी चीन एवं अन्‍य देशों से होती है। अब इन्‍हीं क्षेत्रों में भारत के लिए कई नए अवसर खुल गए हैं। भारत के संदर्भ में थोड़ा पीछे जाकर अध्‍ययन करें तो भारत का चीन के साथ बड़ा व्यापार घाटा (ट्रेड डेफिसिट) रहा है, जो 2018-19 में लगभग 52 अरब डॉलर था। जिसे कम करने का भारत सरकार पर बहुत दबाव रहा, ऐसे में देखा गया कि मोदी सरकार ने अपनी आयात निर्भरता को कम करने के लिए स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देना शुरू किया। कई क्षेत्रों में एक साथ काम शुरू किया गया, जिसमें कि आत्मनिर्भर भारत अभियान, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्युटिकल और मेडिकल उपकरणों जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहन, मोबाइल फोन, ऑटोमोबाइल और सौर पैनल में हुए प्रयासों को देखा जा सकता है। जिसका कि अब बड़े स्‍तर पर परिणाम भी दिखाई दे रहा है।

नए अवसरों में यदि देखें तो इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी में भारत अपनी विनिर्माण क्षमता को बढ़ाकर अमेरिकी डॉलर का एक बड़ा भंडार अपने यहां ला सकता है। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यातकों को फायदा इसलिए भी है, क्योंकि वियतनाम जैसे देशों पर उच्च टैरिफ लगाए जाने के बाद व्यापारियों की एक बड़ी उम्‍मीद भारत ही है। इसी तरह से चीन और थाईलैंड से आयात होने वाली मशीनरी, ऑटो पार्ट्स और खिलौनों पर पड़ने वाले असर का लाभ भारत की तरफ की ओर आता हुआ दिखाई दे रहा है। अमेरिका में चीनी कपड़ों पर टैरिफ बढ़ने से भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री को अमेरिकी बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का एक नया अवसर मिल गया है। अमेरिका द्वारा चीन और बांग्लादेश से आयातित कपड़ों पर अधिक टैरिफ लगाए जाने से भारतीय कपड़े स्‍वभाविक तौर पर सस्ते हो जाएंगे, जिससे भारत के उत्पादों की मांग बढ़ेगी।

यह अच्‍छी बात है कि आईटी क्षेत्र पर टैरिफ का प्रत्यक्ष असर नहीं पड़ता दिख रहा। हालांकि यह तय है कि अमेरिकी बाजार में मंदी और महंगाई का असर इस पर होगा, किंतु यह असर बहुत अधिक नहीं दिखता, क्‍योंकि आईटी प्रोफेशनल जितने अधिक सस्‍ते भारत के हैं, उतने अन्‍य किसी देश के नहीं जोकि अपने आप में श्रेष्‍ठ गुणवत्‍ता भी रखते हैं, इसलिए आगे भी आईटी सेक्‍टर में अमेरिकन का भरोसा भारत के प्रति बना रहेगा। इसके अलावा भारत के पास अमेरिका को सस्ते कृषि उत्पाद आयात करने का यह सुनहरा अवसर है और अपने कृषि निर्यात (जैसे चावल, मसाले, और चाय) को वह वर्तमान की तुलना में बहुत अधिक बढ़ा सकता है, क्‍योंकि चीन पर बढ़े हुए टैरिफ के चलते अमेरिकन कंपनियां यही चाहेंगी कि उन्‍हें सस्‍ता माल मिले, जिसकी कि आज के समय में पूर्ति करना भारत के लिए संभव है।

केमिकल और फार्मास्युटिकल्स में भारतीय फार्मा इंडस्ट्री पहले से ही अच्‍छा प्रदर्शन कर रही हैं। भारत से हर साल लगभग नौ अरब डॉलर की दवा अमेरिका को निर्यात होती है जो देश का सबसे बड़ा औद्योगिक निर्यात क्षेत्र है। ऐसे में अमेरिका की यह नई नीति उसे और अधिक वैश्विक होने का अवसर प्रदान कर रही है। इसके साथ ही जिन देशों पर अमेरिका ने अत्‍यधिक टैरिफ दर निर्धारित की है, वह भी बदले में अपने यहां अमेरिकन वस्‍तुओं पर भारी टैरिफ लगाने जा रहे हैं, कुछ ने तो अपनी बढ़ी हुई टैरिफ नीति घोषित करना भी शुरू कर दिया है। स्‍वभाविक है, ऐसे में भारत के लिए इन देशों में भी अपनी वस्‍तुओं के लिए मुफीद बाजार बनाना आसान हो गया है। सबसे ज्‍यादा चीन के बाद युरोप के कई देश प्रभावित हैं। चीन तो खुले तौर पर अमेरिका के विरोध में उतर आया है। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने साफ कहा है कि चीन अपने अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए दृढ़तापूर्वक जवाबी कदम उठाएगा। संयुक्त राज्य अमेरिका ने एकतरफा आकलन के आधार पर तथाकथित 'रेसिप्रोकल टैरिफ' तैयार किए हैं, जो अंतरराष्ट्रीय ट्रेड रूल के अनुरूप नहीं। उसने अमेरिका से इस नए टैरिफ को रद्द करने के लिए कहा है।

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिका से वाहनों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है। वह अन्‍य कई अमेरिकन वस्‍तुओं पर भारी टैरिफ लगाने जा रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अपने देश की कंपनियों से अमेरिका में निवेश को स्थगित कर देने को बोला है। ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने कह ही दिया है कि उन्‍होंने अपने देश के हितों को ध्‍यान में रखते हुए सभी जरूरी उपाय करना शुरू कर दिए हैं। ऐसे में स्‍वभाविक है इन सभी देशों में और अन्‍य एशियाई देशों में भारत अपने माल की खपत बड़ा सकता है। हालांकि भारत को कुछ क्षेत्रों को नुकसान भी होता दिख रहा है, जैसे कि ज्वैलरी, डेयरी, ऑटो पार्ट्स जैसे कुछ क्षेत्र। क्‍योंकि अमेरिका को भारत हर साल लगभग 11 अरब डॉलर की ज्वैलरी निर्यात करता है, जोकि 30 प्रतिशत है। नए टैरिफ में अमेरिका ने अतिरिक्‍त 18 से 20 प्रतिशत की ज्वैलरी पर शुल्क बढ़ाया है ।

ऑटो एंसिलियरी कंपनियों के माल पर पहले जो 2.4 प्रतिशत शुल्क लगता था, वह बढ़कर 25 प्रतिशत तक हो जाने की संभावना है। किंतु इसके बाद भी जो साफ दिखाई दे रहा है, वह यही है कि अमेरिका द्वारा शुरू किए गए इस टैरिफ वॉर ने भारत को कई क्षेत्रों में और कई देशों में आर्थ‍िक स्‍तर पर नए अवसर प्रदान कर दिए हैं। वास्‍तव में अब हमें चाहिए कि जो नए अवसर मिले हैं, उनका भरपूर लाभ उठाएं।

लेखक - डॉ. मयंक चतुर्वेदी


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