भारतीय वाड्मय में चातुर्मास का विशेष महत्व है । यह आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से आरंभ होता है । इसका समापन कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की एकादशी को होगा । मान्यता है कि इन चार माह में भगवान नारायण पाताल लोक में विश्राम करते हैं इसलिये कोई शुभ काम नहीं होते। लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि यदि चतुर्मास में कोई पवित्र कार्य नहीं हो सकते तब सनातन परंपरा के सभी बड़े और महत्व पूर्ण त्यौहार जैसे गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, नागपंचमी, ऋषि पंचमी, गणेशोत्सव, जन्माष्टमी, संतान सप्तमी, करवा चौथ, हरियाली अमावस, पितृपक्ष, नवरात्र, दशहरा, दीवाली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज आदि सभी बड़े त्यौहार इसी अवधि में ही आते हैं । बड़े त्यौहारों में केवल होली है जो इस चतुर्मास की अवधि से बाहर है । यदि कोई शुभ कार्य नहीं हो सकते तो बड़े बड़े त्यौहारों की श्रृंखला का प्रावधान इसी अवधि में क्यों किया गया है ? इस प्रश्न का उत्तर हमें इन आयोजनों के विश्लेषण में मिल जाता है । चतुर्मास में जो त्यौहार होते हैं, और जिन आयोजन को या कार्यो को निषेध बताया गया है, इन दोनों का विचार करें तो हम पायेंगे कि वर्जित किये गये सभी आयोजन भले दिखने में सामूहिक लगते हों, उनका आयोजन समूह में होता हो पर वे सभी व्यक्तिगत हित के उत्सव हैं, व्यक्तिगत प्रभाव की स्थापना या प्रदर्शन के आयोजन हैं। उन आयोजनों में समाज या राष्ट्र हित निहित नहीं है । लेकिन इन चार माह में जिन त्यौहारों का प्रावधान किया गया है वे सब व्यक्ति, परिवार, समाज राष्ट्र और लोक कल्याण के हैं । व्यक्तिगत हित या व्यक्तित्व के प्रभाव का प्रदर्शन एक बात है और व्यक्ति या व्यक्तित्व का निर्माण बिल्कुल दूसरी बात है । जैसे विवाह, नामकरण, यज्ञोपवीत, नये घर का निर्माण आदि कार्य केवल व्यक्ति या परिवार हित तक ही सीमित होते हैं । इनसे व्यक्तिगत संतोष और सुख तो मिलता है लेकिन परिवार का आंतरिक उत्थान नहीं होता। जबकि दूसरी ओर जिन त्यौहारों के आयोजन होते हैं वे सब किसी निजीत्व के प्रदर्शन या प्रसन्नता के लिये नहीं अपितु व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के सशक्तिकरण और समृद्धिकरण के निमित्त हैं । उनका उद्देश्य व्यक्ति को तन से, मन से, बुद्धि से और विवेक बल से समृद्ध बनाना है, परिवार को सशक्त बनाना है, समाज को संगठित और उन्नत बनाना है और संपूर्ण राष्ट्र एकता के सूत्र में आबद्ध करना है । त्यौहारों के माध्यम से चतुर्मास की इस अवधि में व्यष्टि से समष्टि तक के एकाकार होने की यात्रा होती है ।
चतुर्मास की अवधि में उत्सव परंपरा को समझने के लिये तीन विषयों पर ध्यान देना होगा। एक मनुष्य की संरचना का रहस्य, दूसरा प्राणियों एवं वनस्पति का जीवन में उपयोगिता और तीसरा पुराणों में वर्णित कथाओं का संदेश । यदि कथाओं के रहस्य को समझेंगे तो पायेंगे कि उनमें प्रथम दोनों विन्दुओं के निष्कर्ष का समाधान है । इसके लिये हम मनुष्य को समझें । मनुष्य का व्यक्तित्व दो प्रकार का होता है । एक जो दिखाई देता है और दूसरा जो दिखाई नहीं देता। जैसे चेहरा हाथ पैर त्वचा, माँस हड्डियाँ हृदय, लीवर किडनी आदि सब देख सकते हैं पर मन, भाव विचार वृत्ति, विवेक, ज्ञान, मेधा, प्राण शक्ति आदि दिखाई नहीं देते। जैसे शरीर के रोग होते हैं वेसे ही मन, प्राण चित्त वृत्ति भाव आदि भी रोग ग्रस्त होते हैं। जिस प्रकार शरीर की व्याधियाँ और रोग मनुष्य के मन, वचन विवेक विचार वृत्ति सबको प्रभावित करतीं हैं उसी प्रकार मन, भाव विचारों की व्याधियाँ भी शरीर को प्रभावित करते हैं और इन सबका प्रभाव मनुष्य के जीवन ही नहीं वरन् पूरे वातावरण पर प्रभाव डालता है परिवार पर पड़ताहै समाज पर पड़ता है और देश भर भी पड़ता है । व्यक्ति के स्वास्थ्य का प्रभाव उसकी प्रगति, उसके कार्य और कार्य की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है । इसलिये भारतीय वाड्मय में शरीर के साथ मन बुद्धि ज्ञान विवेक के स्वास्थ्य और आत्म शुद्धि पर भी ध्यान दिया गया है । मनुष्य देह में मुख्यतया पाँच आयाम होते हैं। एक शरीर जो भोजन अर्थात अन्न से आकार पाता है इसे "अन्नमय कोष" जिसे शरीर कहते हैं । दूसरी चेतना जिससे शरीर सक्रिय रहता है इसे "प्राण मय कोष" कहते हैं। तीसरा मन जिसके संकेत पर प्राण शक्ति सक्रिय होकर शरीर को संचालित करती है इसे "मनोमय कोष" कहते हैं । चौथा ज्ञान जिससे उत्पन्न विवेक मन की इच्छाओं को संतुलित करता है इसे "ज्ञानमय कोष" कहते हैं। और अंत में आत्मा आत्मा जिसका संबंध परमात्मा (यूनीवर्स की इनर्जी) से होता है, इसे आत्ममय कोष कहते हैं । चतुर्मास के इन चार माहीनों में मनुष्य को चींटी से हाथी तक सभी प्राणियों, वनस्पति में नन्ही दूव से लेकर विशाल वट और पीपल वृक्ष तक और अंतरिक्ष के सभी गृहों के साथ समन्वय करके जीवन को समृद्घ बनाने का रहस्य छुपा हुआ है । ये चतुर्मास प्राणी के प्रकृति से एकाकार होने की महत्वपूर्ण अवधि है । यदि मनुष्य इस महत्वपूर्ण कालखंड में व्यक्तिगत उत्सव और कार्यों तक सीमित रहेगा तो कैसे स्वयं समुन्नत करेगा, इसलिए देव शयन की अवधारणा स्थापित कर मनुष्य को व्यक्तिगत प्रसन्नता के आयोजन से ऊपर उठकर, व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान और साधना से जोड़ा गया है । आधुनिक विज्ञान भी अनुसंधान के बाद भारत की इस परंपरा के प्रावधान से आश्चर्यचकित है कि यदि इन चार माह में निर्देशित चर्या के अनुकूल जीवन जिया जाय तो प्राणी पूरे वर्ष भर निरोग रहेगा, सशक्त रहेगा और आत्म विश्वास से भरा रहेगा । उसमें अद्भुत रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होगी, परिवार, समाज और राष्ट्र एक सूत्र में बंधा रहेगा ।
लेखक - रमेश शर्मा