फिल्म: 'बिहू अटैक'
कलाकार: देव मेनारिया, डेज़ी शाह, अरबाज खान, राहुल देव, रज़ा मुराद, युक्ति कपूर, अमी मिसोबा, हितेन तेजवानी
निर्देशक: सुज़ाद इक़बाल खान
निर्माता: प्रबीर कांता साहा
रिलीज की तारीख: 16 जनवरी 2026
रेटिंग: 3.5
सीमावर्ती राज्यों में भारतीय सेना और खुफिया एजेंसियों को एक साथ कई मोर्चों पर लड़ना पड़ता है, आंतरिक उग्रवाद से लेकर सीमा पार आतंकवाद तक। इसी संवेदनशील और जटिल विषय को आधार बनाकर पीकेएस फिल्म प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले बनी फिल्म 'बिहू अटैक' असम के प्रमुख त्योहार बिहू के मौके पर 16 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई है। फिल्म का निर्माण प्रबीर कांता साहा ने किया है, जबकि निर्देशन की कमान सुज़ाद इक़बाल खान ने संभाली है।
कहानी
फिल्म की शुरुआत असम के घने जंगलों से होती है, जहां पास के गांव की एक युवती लकड़ी इकट्ठा कर घर लौट रही होती है। जंगल में कुछ बदमाश उसके साथ दरिंदगी की कोशिश करते हैं, लेकिन समय पर पहुंचकर कोर्ट मार्शल झेल चुके आर्मी ऑफिसर राज कुँवर (देव मेनरिया) उसे बचा लेते हैं और सुरक्षित गांव पहुंचाते हैं। यह गांव स्थानीय उग्रवादी गुटों के प्रभाव में है, जहां लगभग सभी पुरुष सिस्टम के खिलाफ हथियार उठाए हुए हैं। राज कुँवर उनसे संवाद के जरिए हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण करने और मुख्यधारा में लौटने की अपील करता है। गांव वालों के सुख-दुख में शामिल होकर वह धीरे-धीरे उनका भरोसा जीत लेता है। लेकिन हालात तब बदलते हैं, जब पाकिस्तान से आए खूंखार आतंकी इन स्थानीय उग्रवादियों से संपर्क करते हैं और बिहू के दिन असम को दहलाने की साजिश रचते हैं।
इस खतरनाक योजना की भनक भारतीय खुफिया एजेंसी के अधिकारी (अरबाज खान) को लगती है। इसके बाद वह राज कुँवर, सेना के अधिकारी (हितेन तेजवानी) और उनकी टीम के साथ मिलकर आतंकियों को पकड़ने और इस हमले को नाकाम करने का प्लान बनाते हैं। यह मिशन कितना सफल होता है, यह जानने के लिए फिल्म देखनी होगी, जिसमें एक्शन और एडवेंचर की भरपूर झलक मिलती है।
अभिनय
देव मेनरिया अपने किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं। एक सैन्य अधिकारी और एक पिता दोनों रूपों में उनके भावनात्मक दृश्य प्रभावी बन पड़े हैं। अरबाज खान, राहुल देव और हितेन तेजवानी अपने-अपने किरदारों को मजबूती देने की कोशिश करते हैं। खासतौर पर राहुल देव और हितेन तेजवानी का अनुभव उनके सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद साफ नजर आता है। दोनों ही अपने किरदारों में संतुलित और विश्वसनीय लगते हैं। चूंकि फिल्म परफॉर्मेंस से ज्यादा कहानी पर केंद्रित है, इसलिए ड्रामा और प्रेजेंटेशन प्रभावी साबित होते हैं।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
निर्देशक सुज़ाद इक़बाल खान ने एक बेहद संवेदनशील विषय पर ईमानदार प्रयास किया है। हालांकि फिल्म का मिडिल पोर्शन कुछ जगह उलझा हुआ लगता है, लेकिन अंतिम हिस्से में कहानी पटरी पर लौट आती है। असम की संस्कृति, भाषा और पारंपरिक पहनावे को प्रामाणिक रूप से दिखाने की कोशिश सराहनीय है। कॉस्ट्यूम डिपार्टमेंट का काम भी फिल्म की विश्वसनीयता बढ़ाता है। सीमित संसाधनों के बावजूद निर्देशक एक जटिल विषय को पर्दे पर पेश करने में काफी हद तक सफल रहते हैं।
निष्कर्ष
'बिहू अटैक' एक ऐसे भारतीय सैन्य अधिकारी की कहानी है, जो पाकिस्तान में पकड़े जाने के बाद अकेला जिंदा लौटता है, जबकि उसके सभी साथी शहीद हो जाते हैं। कोर्ट मार्शल झेलने के बावजूद वह अपना सैन्य धर्म नहीं छोड़ता और देश की सुरक्षा के लिए लगातार काम करता रहता है। फिल्म यह भी दिखाती है कि कैसे भारतीय सेना और खुफिया एजेंसियां मिलकर देश के भीतर सक्रिय उग्रवादी गुटों और सीमा पार से आए आतंकवादियों से निपटने की कोशिश करती हैं।
हालांकि कहानी की बुनावट कुछ जगह ढीली पड़ती है, लेकिन फिल्म के मकसद और विषय को देखते हुए ये कमियां सेकेंडरी लगती हैं। अगर आपको आर्मी, इंटेलिजेंस और आतंकवाद आधारित फिल्में पसंद हैं, तो 'बिहू अटैक' एक बार देखी जा सकती है।
