गाँव के गाँव जलाये : हजारों लोगों को मौत के घाट उतारा
कानपुर में यह सब करके जनरल हैवलॉक बिठूर पहुँचा। उसकी कमान में मेजर स्टीवेन्सन की एक सैन्य टुकड़ी भी थी । जिसमें मद्रास फ्यूसिलियर्स और पंजाब बलूच सैनिकों की संख्या अधिक थी । यहाँ इस सेना का प्रतिरोध करने वाला कोई न मिला । उसने पेशवा नाना साहब के महल पर कब्जा कर लिया और जो व्यक्ति सामने पड़ा उसे मौत के घाट उतार दिया गया । ब्रिटिश सैनिकों ने पहले पेशवा के महल का सामान अपने अधिकार में लिया । जिसमें बंदूकें, हाथी और ऊंट और अन्य कीमती सामान था । और फिर महल में आग लगा दी। इसके बाद जैसा कत्लेआम कानपुर में किया था वैसा ही कत्लेआम बिठूर में किया ।
हैवलॉक की क्रूरता की कार्रवाई की तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने प्रशंसा की और हैवलॉक के नाम को अमर करने केलिये भारत के अंडमान निकोबार के एक द्वीप का नाम "हैवलॉक द्वीप" रखा । यह नाम स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्षों तक यथावत रहा । इस नाम को पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बदलकर स्वराज द्वीप किया । हैवलॉक द्वारा कानपुर में किये गये अत्याचार के वर्णन इतिहास की पुस्तकों में भरे पड़े हैं। अंग्रेजों के कानपुर आपरेशन में हैवलॉक के साथ रहे कमांडर शेरर ने अपनी पुस्तक "हैवलॉक्स मार्च ऑन कानपुर" में भी इस नरसंहार और अत्याचार का वर्णन किया है।
अंग्रेजों के ऐसे नरसंहार और अत्याचारों से इतिहास की पुस्तकों में तो हैं ही । हर जिले के गजेटियरों में भी हैं। पर आज की अधिकांश पीढ़ी इससे अनभिज्ञ है । यहाँ तक कि जिस हैवलॉक के अत्याचार से कानपुर का इतिहास भरा है उसी हैवलॉक के नाम पर बने द्वीप पर पिकनिक मनाकर गौरवान्वित हुआ करते थे । हाँ उस द्वीप का नाम बदलने से कुछ लोग चौंके और इतिहास के पन्ने पलटे । तब यह सच्चाई सामने आ सकी ।
लेखक :- रमेश शर्मा
