31 मार्च 2024 को समाप्त वित्तीय वर्ष में भारत के अनुसूचित वाणिज्यिक बैकों का पूंजी पर्याप्तता अनुपात 16.8 प्रतिशत का रहा है तथा सकल अनर्जक आस्ति अनुपात पिछले कई वर्षों के सबसे निचले स्तर अर्थात 2.8 प्रतिशत पर एवं निवल अनर्जक आस्ति अनुपात केवल 0.6 प्रतिशत पर आ गया है जो अपने आप में एक रिकार्ड है। न केवल अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक मजबूत बने हुए हैं अपितु गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) भी स्वस्थ बनी हुई हैं, जिनका पूंजी पर्याप्तता अनुपात 26.6 प्रतिशत, सकल अनर्जक आस्ति अनुपात 4.0 प्रतिशत और आस्तियों पर प्रतिलाभ 3.3 प्रतिशत रहा है। पूंजी पर्याप्तता अनुपात का मजबूत स्थिति में रहने का आश्य यह है कि इन बैकों के पास पर्याप्त मात्रा में पूंजी उपलब्ध है और इन बैकों में किसी प्रकार की आर्थिक परेशानी आने पर यह बैंक सफलतापूर्वक उस आर्थिक परेशानी का सामना कर सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, अनर्जक आस्ति अनुपात का सबसे कम स्तर पर आने का आश्य यह है कि बैकों द्वारा प्रदान किए जा रहे ऋणों की अदायगी समय पर हो रही है एवं इन ऋणों पर पर कोई दबाव दिखाई नहीं दे रहा है।
भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 में नागरिकों की बचत दर घटकर सकल घरेलू उत्पाद के 18.4 प्रतिशत तक नीचे आ गई है जो वर्ष 2013 से 2022 के बीच में औसतन 20 प्रतिशत की रही है। इसी प्रकार, एक अन्य मानक के अनुसार, वर्ष 2013 से 2022 के बीच भारतीय नागरिक अपनी कमाई का औसतन 39.8 प्रतिशत भाग बचत करते थे परंतु वित्तीय वर्ष 2022-23 में यह भाग घटकर 28.5 प्रतिशत तक नीचे आ गया है। बचत, दरअसल, दो प्रकार की होती है, एक वित्तीय बचत और दूसरे, सम्पत्ति निर्मित करने हेतु बचत। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, भारतीय नागरिकों की वित्तीय बचत जरूर कम हुई है परंतु सम्पत्ति निर्मित करने हेतु की गई बचत में वृद्धि दृष्टिगोचर है। जैसे, मकान बनाने हेतु एवं कार खरीदने हेतु की गई बचत को सम्पत्ति निर्मित करने हेतु की गई बचत की श्रेणी में रखा जाता है। भारत में हाल ही के वर्षों में सम्पत्ति निर्मित करने हेतु बचत का रुझान बहुत तेज गति से आगे बढ़ा है। आवास एवं कार आदि जैसी सम्पत्तियां खरीदने हेतु भारत में मध्यवर्गीय परिवार अपनी बचत के साथ ही बैकों से ऋण लेकर भी इन सम्पत्तियों का निर्माण कर रहे हैं। इससे अर्थव्यवस्था के चक्र में भी तेजी दिखाई देने लगी है क्योंकि मकान बनाने के लिए स्टील, सिमेंट, आदि पदार्थों की खपत भी बढ़ रही है एवं इन उत्पादों का उत्पादन भी विनिर्माण इकाईयों द्वारा अधिक मात्रा में किया जा रहा है, इससे देश में रोजगार के अवसर भी निर्मित हो रहे हैं। कुल मिलाकर, इससे देश के अर्थ चक्र में तेजी दिखाई देने लगी है। साथ ही, वित्तीय बचत कम इसलिए भी हो रही है क्योंकि अब देश का पढ़ा लिखा नागरिक वित्तीय रूप से अधिक साक्षर हो गया है एवं अब यह स्थिति समझने लगा है कि बैंकों एवं पोस्ट ऑफिस में बचत करने पर मिल रहे ब्याज की तुलना में शेयर (पूंजी) बाजार में निवेश करने तथा सोने एवं चांदी जैसे पदार्थों में निवेश करने से अधिक आय का अर्जन सम्भव होता दिखाई दे रहा है। साथ ही, भूमि का टुकड़ा खरीदकर उस पर भवन का निर्माण कर तुलनात्मक रूप से अधिक आय का अर्जन किया जा सकता है। अतः बैकों एवं पोस्ट ऑफ़िस के स्थान पर अब देश के नागरिक देश के पूंजी बाजार में अपनी बचत का निवेश करने लगे हैं।
लेखक - प्रहलाद सबनानी
