अयोध्या क्या खोया और क्या पाया है अब भी विचार ना किया !! आखिर फैजाबाद से पराजय स्वीकार क्यों? Date : 08-Jun-2024 अरी अयोध्या ! यह क्या किया ? साष्टांग दंडवत को ठुकरा दिया, पूजन अर्चन अभिवादन अभिनंदन को ठेंगा दिखा दिया । तुमको पलकों पर नही शीश पर रखा अयोध्या और तुमने धरा खींच ली पांवों से । पता है आज तुम्हारा नाम लेकर चिढ़ा रहा है हमें सारा संसार, मुस्कुरा रहा हैं व्यंग्य से । क्या पाया तुमने और क्या गंवाया, इसका कुछ अंदाजा भी है तुम्हें अयोध्या। तुम्हें तो उदाहरण होना था जीत का, तुम्हें नींव रखनी थी अटल अट्टालिका की । तुम्हें बड़ा होना था मक्का से, मदीना से, येरुशलम से, वेटिकन सिटी से । तुम्हें क्या होना था अयोध्या और क्या हो गईं तुम !! शायद तुम्हें कर्फ्यू से प्रेम है, प्रेम है तुम्हें टेंट से, प्रेम है अपने सूने सूने घाटों से , प्रेम है सरयू को लथपथ करने वाली रक्त की गंध से, प्रेम है तुम्हें अपने एकाकीपन से, तुम्हें वनवास भाता है अयोध्या, राजतिलक नही। क्या कहोगी अयोध्या, रोके नही रुकते इन आंसुओं के प्रवाह से, क्या कहोगी उलाहना पाकर निष्प्राण पड़े बजरंगी उत्साह से, क्या कहोगी दीप बालते श्रद्धावान मन से, क्या कहोगी तुम्हारे लिए संसार भर से लड़ जाने वाले समर्पण से , क्या कहोगी अयोध्या !! क्या मुंह दिखाओगी कल सुबह राम लला को, जानकी को, लखनलाल को ? बजरंगी के लाल चक्षुओं का सामना कर पाओगी तुम ? फिर कोई कैसे आएगा अयोध्या तुम्हारे पास, तुम्हें संसार की सबसे भव्य नगरी बनाने का स्वप्न लेकर, और क्या सेवा करूं मां का विनम्र प्रश्न लेकर , सियावर रामचंद्र की जै का गगनभेदी स्वर लेकर, आस्था का लहलहाता समंदर लेकर कौन आएगा अयोध्या ?? ये क्या किया अयोध्या और क्यों किया अयोध्या