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लोकहित ही पत्रकारिता का नारदीय सूत्र!

Date : 25-May-2024

 मनुष्य चाहे दुर्जन हो या सज्जन, सत्य हमेशा उसकी आँखों में भटकटैया की भाँति गड़ता है। स्तुति देवताओं को भी पसंद थी और दानवों को भी। यहां नेता भी स्तुतिजीवी है और खलनेता भी। इसलिए वहां देवर्षि नारद देव-दानवों को खटकते थे और यहां पत्रकार किसी को नहीं सुहाता। वैसे भी पत्रकार देवर्षि नारद के ही वंशज समझे जाते हैं।

नारदजी सर्वगुण संपन्न थे। भक्तियोग, वेदांत सूत्र के संपादक तो थे ही भाषा, विज्ञान, ज्योतिष, संगीत, व्याकरण और सबसे बड़ा संचार कौशल का गुण था। यह उनके संचार कौशल का ही परिणाम था कि कंस को अपने भांजे-भांजियोंं का वध करने के लिए समझा आए। हिरण्यकशिपु के अहंकार को जगाकर उसे विष्णु भक्त पुत्र प्रहलाद का ही दुश्मन बना दिया। लोक ने नारद के इस कृत्य को अच्छे से नहीं लिया जबकि वस्तुतः उनका यह प्रयोजन व्यापक लोककल्याण के लिए ही था। उनका लक्ष्य था ऐनकेनप्रकारेण आसुरी शक्तियों का विनाश। 
नारदजी को लोक में उल्टा-पुल्टा रचने के लिए जाना जाता है। इसे हम आज की पत्रकारिता का नवाचार भी कह सकते हैं। वे त्रिकालदर्शी थे किसी के भीतर की झांक लेते थे। दस्युवृत्ति कर रहे वाल्मीकि के भीतर उन्होंने आदिकवि का रूप देखा। उनके ऋषित्व को बाहर ला दिया। वाल्मीकि को नारद ने ही प्रथमतः रामकथा सुनाई और इसे छंदबद्ध करने की सलाह दी। महर्षि वाल्मीकि रामकथा की वजह से अमर हो गए। उनमें ईश्वरीय अंश देखा जाने लगा। इसी तरह वेदव्यास को श्रीमद्भागवत कथा लिखने के लिए प्रेरित किया। 
 जहां महाभारत को पूजाघर,क्या घर के पुस्तकालय में ही जगह मिलनी मुश्किल हो गई वहीं श्रीमद्भागवत को ही दैवीय दृष्टि से पूजा जाने लगा। इस तरह रामायण और श्रीमद्भागवत जैसे मोक्षदायी ग्रंथों के पीछे देवर्षि की ही प्रेरणा है। महाभारत को आज भी लोकमानस में एक कलहकारी ग्रंथ माना जाता है और वह पूजा-पाठ का हिस्सा नहीं बन पाया। जबकि श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णुसहस्रनाम, भीष्म व विदुर का नीति शास्त्र व और बहुत से पवित्र प्रसंग महाभारत के ही हिस्से है।
सत्य का साथ और विश्वास का कवच हो तो प्रलय में भी बालबांका नहीं हो सकता। सत्यनिष्ठा का प्रतिफल ही था कि नारदजी पर कभी हमले नहीं हुए न देवों की ओर से न दानवों की ओर से। आज भी जो पत्रकारिता में जो सत्यनिष्ठ विश्वसनीयता के साथ अपना काम करता है तो उसका बालबांका नहीं होता। यह ठीक है कि उसे सत्ता के साकेत में जगह नहीं मिलती, पर उस साकेत का दरबार हमेशा सत्यनिष्ठों से भयाक्रांत रहता है।
एक बात और.. भक्तशिरोमणि, परमग्यानी, संवाद कुशल, संगीत साधक, और प्रजापति ब्रह्मा का पुत्र होने के बावजूद भी लोक ने नारदजी को पूज्यनीय स्थान नहीं दिया। पूजापाठ.. यज्ञ याग में नारदजी कहीं नहीं मिलते। न मंदिर में इनकी मूर्ति न इनकी स्तुति। जबकि ये देवताओं से भी एक बित्ता ऊपर देवर्षि हैं। और तो और कोई अपने पुत्र का नाम भी नारद रखने के बारे में नहीं सोचता। ऐसा क्यों..! ऐसा इसलिए कि सत्य सभी की आँखों में भटकटैया की तरह गड़ता है। इसी सत्यान्वेषण के चलते ऋषि कहोड़ ने अपने ही पुत्र को अंगभंगीय विद्रूपता का शाप दे दिया जो महान तथ्यान्वेषी दार्शनिक अष्टावक्र के नाम से जाने गए। ये विषयांतर नहीं..दृष्टांतर है। 
यह भी कम दिलचस्प नहीं कि २०१८  में  मध्यप्रदेश में मुद्दतों बाद जब अल्पकाल के लिए कांग्रेस की सरकार आई। उसके एजेंडा में नारदजी ही सबसे ऊपर रहे। क्योंकि  म्लेच्छ संस्कृति में पत्रकारिता में नारद की स्थापना क्षम्य नहीं। सो कांग्रेस सरकार आई तो सबसे पहले एक यही 'पुण्यकर्म' किया कि माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से नारदजी को निर्वासित करने का आदेश जारी किया। 
पुस्तकालयों में जहां जहां भी नारदजी से संदर्भित पुस्तकें, तस्वीरें थी उनको हटवा दिया। सरकार बदलते ही सूत्र बदल जाते हैं।  विश्वविद्यालय के नए उत्साही कुलपति का नजला पहले दिन नारदजी व माता सरस्वती पर गिरा। पहले विवि. के प्रवेशद्वार पर लिखे नारदजी के संचार सूत्रों को पुतवाया फिर प्रवेश किया। इस घटनाक्रम से हमने जाना कि सरकारों के बदल जाने से हमारे सरोकार भी बदल जाते हैं
 

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