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25 मई जयंती विशेष :- आजाद हिंद फौज की बुनियाद रखने वाले रासबिहारी बोस

Date : 25-May-2024

बहुत से लोग आजाद हिंद फौज और सुभाष चंद्र बोस को जानते हैं लेकिन आजाद हिंद फौज की बुनियाद रखने वाले रासबिहारी बोस से परिचित नहीं हैं। देश के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। आजाद हिंद फौज के गठन में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी जिसकी कमान बाद में उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सौंपी थी।आज हम रासबिहारी बोस जी के जयंती के अवसर पर जानेंगे उनके जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी.. 

रासबिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 में पश्चिम बंगाल में हुआ था। शुरू से ही अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में रूचि रखने वाले रासबिहारी ने बहुत कम उम्र से अंग्रेजी सत्ता की खिलाफत शुरू कर दी थी। बंगाल में उस दौर में ब्रिटिश सत्ता द्वारा निर्मित अकाल और महामारियों ने भारी तबाही मचाई थी। इसके बाद बंगाल विभाजन ने उन्हें अंग्रजों के और खिलाफ कर दिया। इसके बाद वह पूरी तरह अंग्रेजों के खिलाफ गतिविधियों में जुट गए।
भले ही उन्होंने ब्रिटिश सरकार में नौकरी की लेकिन वह हमेशा भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ थे। 1905 में बंगाल के विभाजन से अंग्रेजों के प्रति उनके मन में और नफरत भर गई। वैसे वह शुरू से क्रांतिकारियों जैसे बाघा जतिन और अन्य के संपर्क में थे लेकिन बंगाल के विभाजन के बाद क्रांतिकारियों की मीटिंगों में हिस्सा लेना तेज कर दिया। उन्होंने बचपन में ही बम बनाना सीख लिया था। अपने इस कौशल से उन्होंने क्रांतिकारियों की गतिविधियों में योगदान दिया। जब मैजिस्ट्रेट किंग्सफर्ड को मारने का प्लान बनाया गया तो रासबिहारी बोस ने ही बम बनाया था। खैर इस मिशन में चूक हो गई थी। खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने गलती से किंग्सफर्ड की जगह किसी और को मार दिया और पकड़े गए। बाद में उनको फांसी दे दी गई। लेकिन रासबिहारी किसी तरह बंगाल से बचकर निकलने में कामयाब हो गए। वह देहरादून चले गए और पंजाब एवं उत्तर प्रदेश के क्रांतिकारियों से भेंट की।
रासबिहारी बोस अंग्रेजों को हिंसक तरीके देश से मार-पीट कर बाहर फेंकने के समर्थक थे। वर्ष 1912 में देश की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किए जाने के उपलक्ष्य में अंग्रेजों ने एस कार्यक्रम का आयोजन किया था। इस दौरान भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया। हालांकि, इस बम से वायसराय जख्मी तो हुआ लेकिन उसकी मौत नहीं हुई। लेकिन इस घटना ने पूरी ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला कर रख दी। इस योजना के विफल होते ही अंग्रजों ने क्रांतिकारियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। 
अमेरिका और कनाडा में रहने वाले पंजाबियों ने गदर पार्टी का गठन किया था। पार्टी के गठन का मकसद भारत को आजाद कराना था। 1914 में अमेरिका और कनाडा में बसे भारतीयों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए भारत आना शुरू कर दिया। वे अपने साथ गोलाबारूद भी ला रहे थे। इस गदर आंदोलन की कमान रासबिहारी बोस को सौंपी गई। उन्होंने 21 फरवरी, 1915 को ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ बगावत की योजना बनाई थी। लेकिन अंग्रेजों को इसकी भनक लग गई जिसके बाद बगावत की योजना को टाल दिया गया। इसके बाद रासबिहारी बोस अंग्रेजों के निशाने पर आ गए। अंग्रेजों से बचने के लिए रासबिहारी जापान चले गए जहां उन्होंने क्रांति के नए अध्याय की शुरुआत की।
रासबिहारी ने जापान में खुद को रबिंद्रनाथ टैगोर का दूर का रिश्तेदार बताया। वहां उन्होंने पत्रकार के तौर पर काम किया और 1923 में जापान की नागरिकता हासिल की। उन्होंने ए.एम.नायर के साथ जापानी शासन को भारत के बाहर भारत की आजादी के आंदोलन में मदद के लिए राजी किया। बोस ने 28 से 30 मार्च, 1942 तक तोक्यो में एक सम्मेलन का आयोजन किया। उसी सम्मेलन में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना का फैसला लिया गया।

आजाद हिंद फौज का गठन
कहा जाता है कि लाला लाजपत राय के कहने पर रासबिहारी बोस जापान चले गए थे। यहां राजा पी. एन. टैगोर के नाम से रहने लगे। उन्होंने अंग्रेजी अध्यापन, लेखन और पत्रकारिता का कार्य किया। ‘न्यू एशिया’ नामक समाचार-पत्र शुरू किया और जापानी भाषा में कुल 16 पुस्तकें लिखीं। मार्च 1942 में टोक्यो में उन्होंने ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ की स्थापना की और भारत की स्वाधीनता के लिए एक सेना बनाने का प्रस्ताव भी पेश किया। यहीं से शुरुआत हुआ आजाद हिंद फौद की। 


सुभाष चंद्र बोस को सौंपी कमान
इंडियन इंडिपेंडेंस लीग के सम्मेलन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जापान आमंत्रित किया गया था। रासबिहारी और सुभाष चंद्र बोस दोनों ही अंग्रजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के समर्थक थे। अंग्रजों की बड़ी खिलाफत करने के कारण सुभाष चंद्र बोस काफी मशहूर हो चुके थे। कहा जाता है कि उस समय सुभाष बर्लिन से जापान पहुंचे। रास बिहारी ने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की सैन्य शाखा के रूप इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) का गठन किया और सुभाषचंद्र बोस को इसका अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों की हालत कैसे खराब की यह सभी जानते हैं। 


1945 में हुआ निधन
रास बिहारी बोस ने एक जापानी महिला से ही शादी की और वहां के नागरिक बन गए थे। 21 जनवरी 1945 को रास बिहारी बोस का निधन हो गया। जापान की सरकार ने उन्हें  द सेकेंड ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन से सम्मानित किया था। हालांकि, इसके दो वर्ष बाद ही देश की स्वतंत्रता का उनका सपना पूरा हुआ था। आजादी के इस अमृत महोत्सव में पूरा देश रासबिहारी बोस को उनके योगदान के लिए धन्यवाद करता है।

 


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