प्रथमत : सन् 1857 के महान् स्वतंत्रता संग्राम के महानायक महा महारथी श्रीयुत पेशवा नाना साहब की जयंती पर शत् शत् नमन है | यदि धोखेबाजी और सौदेबाजी नहीं होती,तो महारथी नाना साहब के नेतृत्व में तात्या टोपे और वीरांगना लक्ष्मीबाई के आगे बरतानिया सरकार ने लगभग घुटने टेक दिए थे.. कानपुर विजय के उपरांत ग्वालियर में नाना साहब को भारत का पेशवा घोषित कर जंग को विस्तृत रुप प्रदान किया | लेकिन गद्दारों की वजह से असफलता हाथ लगी। इस तरह भारत में केवल 90 वर्ष के लिए सत्ता हिन्दुओं के हाथ से ब्रितानियों के हाथ में गई।क्योंकि सन 1757 से सन् 1857 तो संघर्ष का काल रहा है। भारत की सत्ता प्रबल संघर्ष के बाद मराठों के हाथ से ब्रितानियों के हाथ गई। मुगलों के हाथ से नहीं गई क्योंकि पेंशनर नाम मात्र मुगल बहादुर शाह जफर तो अंग्रेजों के पपेट (कठपुतला) थे।वैंसे तो सन् 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद राबर्ट क्लाइव ने 1765 की इलाहाबाद की संधि के बाद इनके पूर्वज शाह आलम द्वितीय को पेंशन भोगी बनाकर इलाहाबाद में ही कैद कर रखा था,जिसे महान् पेशवा माधवराव जी ने मुक्त कराया था, उसके बाद महादजी सिंधिया के भी संरक्षण में तथाकथित मुगल बादशाह बचे रहे,परंतु उसके बाद ये तथाकथित मुगल बादशाह अंग्रेजों के कठपुतला बन गए-इसलिए ध्यान रहे कि भारत में अंग्रेजों ने सन् 1818 में मराठों से कुटिलता से सत्ता प्राप्त की थी, न कि तथाकथित मुगलों से, करेला ऊपर से नीम चढ़ा ये था कि निकम्मे शायर उम्रदराज थे, वो खुद को भी न संभाल पाते थे, बहादुर शाह जफर की उम्र लगभग 82 वर्ष की थी, उनसे तलवार भी न उठती थी, साथ में निकम्मे शायर इश्क के मारे थे, वह स्वयं कहते थे कि "इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया,वरना हम भी थे आदमी काम के" ऐंसे में कई लोगों ने उन्हें बादशाह घोषित कर बहुत बड़ा चूतियापा किया परिणाम स्वरूप जब हडसन इन्हें पकड़ने आया तो ये श्रीमान अपने दो बेटों के साथ हुमायूँ की कब्र के पास छुपे बैठे थे, धर पकड़े गए और रंगून भेज दिए गए... वहीं दूसरी और नाना साहब ने भारत के पेशवा के अनुकूल तात्या टोपे और वीरांगना लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर व्यापक जंग लड़ी और धोखेबाजी तथा सौदेबाजी के कारण असफलता हाथ लगी नहीं तो भारत तभी स्वतंत्र हो जाता है।
"सन् 1857 के महान् स्वतंत्रता संग्राम के मुखिया महा महारथी श्रीयुत पेशवा नाना साहब थे , न कि निकम्मे शायर बहादुर शाह जफर "
प्रथमत : सन् 1857 के महान् स्वतंत्रता संग्राम के महानायक महा महारथी श्रीयुत पेशवा नाना साहब की जयंती पर शत् शत् नमन है | यदि धोखेबाजी और सौदेबाजी नहीं होती,तो महारथी नाना साहब के नेतृत्व में तात्या टोपे और वीरांगना लक्ष्मीबाई के आगे बरतानिया सरकार ने लगभग घुटने टेक दिए थे.. कानपुर विजय के उपरांत ग्वालियर में नाना साहब को भारत का पेशवा घोषित कर जंग को विस्तृत रुप प्रदान किया | लेकिन गद्दारों की वजह से असफलता हाथ लगी। इस तरह भारत में केवल 90 वर्ष के लिए सत्ता हिन्दुओं के हाथ से ब्रितानियों के हाथ में गई।क्योंकि सन 1757 से सन् 1857 तो संघर्ष का काल रहा है। भारत की सत्ता प्रबल संघर्ष के बाद मराठों के हाथ से ब्रितानियों के हाथ गई। मुगलों के हाथ से नहीं गई क्योंकि पेंशनर नाम मात्र मुगल बहादुर शाह जफर तो अंग्रेजों के पपेट (कठपुतला) थे।वैंसे तो सन् 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद राबर्ट क्लाइव ने 1765 की इलाहाबाद की संधि के बाद इनके पूर्वज शाह आलम द्वितीय को पेंशन भोगी बनाकर इलाहाबाद में ही कैद कर रखा था,जिसे महान् पेशवा माधवराव जी ने मुक्त कराया था, उसके बाद महादजी सिंधिया के भी संरक्षण में तथाकथित मुगल बादशाह बचे रहे,परंतु उसके बाद ये तथाकथित मुगल बादशाह अंग्रेजों के कठपुतला बन गए-इसलिए ध्यान रहे कि भारत में अंग्रेजों ने सन् 1818 में मराठों से कुटिलता से सत्ता प्राप्त की थी, न कि तथाकथित मुगलों से, करेला ऊपर से नीम चढ़ा ये था कि निकम्मे शायर उम्रदराज थे, वो खुद को भी न संभाल पाते थे, बहादुर शाह जफर की उम्र लगभग 82 वर्ष की थी, उनसे तलवार भी न उठती थी, साथ में निकम्मे शायर इश्क के मारे थे, वह स्वयं कहते थे कि "इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया,वरना हम भी थे आदमी काम के" ऐंसे में कई लोगों ने उन्हें बादशाह घोषित कर बहुत बड़ा चूतियापा किया परिणाम स्वरूप जब हडसन इन्हें पकड़ने आया तो ये श्रीमान अपने दो बेटों के साथ हुमायूँ की कब्र के पास छुपे बैठे थे, धर पकड़े गए और रंगून भेज दिए गए... वहीं दूसरी और नाना साहब ने भारत के पेशवा के अनुकूल तात्या टोपे और वीरांगना लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर व्यापक जंग लड़ी और धोखेबाजी तथा सौदेबाजी के कारण असफलता हाथ लगी नहीं तो भारत तभी स्वतंत्र हो जाता है।
