भारत में धर्म आधारित आरक्षण.....
Date : 20-May-2024
सत्ता पाने के लिए और शासन पर बने रहने के लिए प्रत्येक पार्टी अपने घोषणा पत्र में कोई न कोई नई बात अवश्य शामिल करती है। यह बातें राष्ट्र के हित जैसे.... नागरिकों के विकास, महिलाओं की सुरक्षा और संरक्षण तथा युवाओं के उज्जवल भविष्य से संबंधित हो तो..... यहाँ तक तो उचित है, किंतु जब किसी धर्म विशेष को दिए जाने वाले आरक्षण से संबंधित बात हो तो यहाँ संपूर्ण राष्ट्र की प्रगति, संविधान के प्रति आस्था और लोकतंत्र के ऊपर विश्वास को लेकर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है।
आज केन्द्र की भारत विरोधी पार्टियाँ , बिहार , केरल , कर्नाटक , तेलंगाना और पश्चिम बंगाल की प्रदेश सरकारें खुलें स्वरों में मुखर होकर मुसलमान को आरक्षण देने की बात कर रही हैं , जो संविधान सम्मत नहीं है । भविष्य में उनको आरक्षण देने पर अजा, अजजा एवं अपिव पर दिए गए आरक्षण पर असर पड़ेगा । संविधान में मुसलमानों की जो जातियाँ हैं उन्हें इस श्रेणी में पहले से ही आरक्षण मिलता है किंतु मुसलमान को अलग से कोई आरक्षण नहीं मिलता। उदाहरण स्वरुप केरल में मुसलमान को उच्च शिक्षा में 8% आरक्षण मिलता रहा है, जो की अन्य पिछड़ा वर्ग के 30% आरक्षण में कटौती करके दिया जा रहा है। वहीं कर्नाटक सरकार ने सभी मुस्लिम जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया है , जिससे सभी मुसलमानों को कर्नाटक में चार प्रतिशत आरक्षण मिल गया है। कर्नाटक में 32% ओबीसी को आरक्षण है । "राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष हंसराज गंगाराम अहीर" कहते हैं- कर्नाटक में ओबीसी के लिए 32 प्रतिशत आरक्षण है। इसके अंतर्गत उन्होंने श्रेणी 1, 2(अ), 2(ब), 3(अ), 3(ब) जैसे विभाजन किए हैं। श्रेणी 1 के अंतर्गत मुसलमानों की 17 जातियों सहित 95 जातियाँ हैं। श्रेणी 2(ब) में 19 मुसलमानों सहित 103 जातियाँ हैं।