कहा जाता है कि कवी सूरदास बचपन से संत प्रवृत्ति के थे। इन्हें गाने की कला वरदान रूप में मिली थी। अपनी गायन की कला के चलते वे जल्द ही प्रसिद्ध हो गए। इसके बाद वे आगरा के पास गऊघाट पर रहने लगे। यहीं पर उनकी मुलाकात वल्लभाचार्य जी से हुई। वल्लभाचार्य जी ने ही सूरदास जी को पुष्टिमार्ग की दीक्षा दी और श्री कृष्ण की लीलाओं का दर्शन करवाया। वल्लभाचार्य ने इन्हें श्री नाथ जी के मंदिर में लीला गान का दायित्व सौंपा, जिसे ये जीवन पर्यंत निभाते रहे।
