भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन भारत में आधुनिक शिक्षा के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे। उन्होंने अपने नेतृत्व में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान दिया।
डॉ. जाकिर हुसैन ने अपना सारा जीवन शिक्षा को समर्पित कर दिया था। उन्होंने एंग्लो ऑरियंटल कॉलेज का बहिष्कार किया था। तब उनके साथी छात्रों ने उनसे पूछा कि पढ़ेंगे कहां ? तो उन्होंने कहा था कि राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान में पढ़ेंगे। इस पर साथियों ने पूछा कि यह राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान कहां है। तो उन्होंने कहा कि हम यहीं अपनी शिक्षा संस्थान खोलेंगे जो हमारा खुद का और हमारे देश का संस्थान होगा। उसमें अंग्रेजी सरकार की सहायता नहीं ली जाएगी
अपने इसी निश्चय के साथ उन्होंने एक राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान की स्थापना के सिलसिले में डॉ. हकीम अजमल खान, डॉ. अंसारी और मौलाना मोहम्मद अली के अलावा अन्य प्रमुख हस्तियों से मुलाकात की। आखिरकार अलीगढ़ में बहुत छोटी सी जगह में 29 अक्टूबर 1920 को जामिया मिलिया इस्लामिया की बुनियाद रखी गई। इसके बाद कुछ कारणों के चलते महात्मा गांधी की सलाह पर जाकिर हुसैन जामिया को अलीगढ़ से दिल्ली ले आए। दिल्ली में कड़ी मेहनत और लगन के साथ जामिया को स्थापित किया और 29 बरस की आयु में विश्वविद्यालय के कुलपति बने।
शिक्षा के विद्वान के तौर पर 1952 में वे राज्यसभा के सदस्य नामांकित हुए। 1957 में बिहार के राज्यपाल बने और फिर 1962 में देश के उपराष्ट्रपति बने। देश के लिए उनके काम के सम्मान के तौर पर 1963 में उनको सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया गया।
राष्ट्रपति के नाम का ऐलान ऐसे हुआ
देश के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति बने
आजादी के 20 साल के बाद देश को तीसरा राष्ट्रपति मिलना था और पहली बार कोई मुस्लिम इसकी रेस में था। उस समय जनसंघ ने आपत्ति उठाई कि एक मुस्लिम को राष्ट्रपति के तौर पर स्वीकार करने के लिए देश के लोग राजी नहीं हैं। हिंदू-मुस्लिम की खाई को पाटने और जाकिर हुसैन की उम्मीदवारी मजबूत करने के लिए इंदिरा गांधी ने जेपी से संपर्क किया। इसके बाद जेपी ने कहा कि अगर जाकिर साहब राष्ट्रपति नहीं बने, तो देश की कौमी एकता के लिए ठीक नहीं होगा। देश दो टुकड़ों में बंट जाएगा। आखिरकार जाकिर हुसैन की जीत हुई और उन्हें देश का तीसरा राष्ट्रपति चुना गया।
राष्ट्रपति पद पर रहते हुए निधन
जाकिर हुसैन आखिरी समय में काफी बीमार रहे। शुगर की बीमारी चरम पर थी। ग्लूकोमा से आंखों की रोशनी कम पड़ती जा रही थी। 13 मई 1969 को जाकिर हुसैन के निधन वाले दिन सुबह डॉक्टर चेकअप के लिए आए तो वह डॉक्टरों को इंतजार करने की बात कहकर बाथरूम में चले गए। काफी देर बाद भी जब वह नहीं लौटे तो उनके विशेष सेवक इसहाक ने बाथरूम का दरवाजा खटखटाया। भीतर से जवाब नहीं मिला तो दूसरे दरवाजे से वह बाथरूम में गया। उसने देखा कि जाकिर हुसैन जमीन पर बेसुध पड़े थे। डॉक्टरों ने बताया कि उनका निधन हो गया। 5 लाख से ज्यादा लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए आए थे। राष्ट्रपति भवन के बाहर करीब तीन मील तक लोग उनकी झलक पाने के लिए लंबी कतार में खड़े रहे थे। जाकिर हुसैन देश के पहले राष्ट्रपति थे, जिनका पद पर रहते हुए इंतकाल हो गया था। जाकिर हुसैन 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक राष्ट्रपति पद पर रहे।
