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5 जनवरी 1880 : सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी बारीन्द्रनाथ घोष का जन्म

Date : 05-Jan-2024

युवकों को सशस्त्र क्रान्ति का प्रशिक्षण दिया था : जन जागरण के लिये समाचारपत्र भी निकाला

अंग्रेजों से भारत की मुक्ति के लिये जिन क्राँतिकारियों ने अपनी स्वर्णिम सुख सुविधा का परित्याग करके बहुआयामी संघर्ष किये और जेल गये उनमें बारीन्द्र घोष भी हैं । उन्होंने प्रत्यक्ष संघर्ष तो किया ही साथ ही जन जागरण के लिये समाचार पत्र निकाला, बैठके की और युवाओं को सक्रिय किया । 

ऐसे अमर क्राँतिकारी और पत्रकार बारीन्द्रनाथ घोष का जन्म 5 जनवरी 1880 को लन्दन के पास क्रोयदन नामक कस्बे में हुआ था। यद्धपि उनका पैतृक निवास बंगाल के कोन्नगर में था। पिता श्री कृष्णनाथ घोष अपने समय के सुप्रसिद्ध चिकित्सक और जिला सर्जन थे । माता देवी स्वर्णलता प्रसिद्ध समाज सुधारक व विद्वान राजनारायण बसु की पुत्री थीं। महर्षि अरविन्द, जो पहले क्रन्तिकारी लेकिन बाद में अध्यात्मिक संत हो गए थे, उनके बड़े भाई थे जबकि उनके एक अन्य बड़े भाई श्री मनमोहन घोष अंग्रेजी साहित्य के विद्वान और ढाका यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर थे। बारीन्द्र नाथ जी अपने संक्षिप्त नाम बारिन घोष के नाम से मशहूर थे । 

बारिन घोष की स्कूली शिक्षा देवगढ में हुई और उच्च शिक्षा के लिये 1901 में पटना भेजे गये । अपनी पढ़ाई के साथ उन्होंने बरोड़ा मिलिट्री ट्रेनिंग भी ली। उन दिनों श्री अरविन्द क्राँतिकारी गताविधियों से जुड़े हुये थे । उनसे प्रभावित होकर बारिन भी क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़ गये । 1902 में अपनी पढ़ाई पूरी कर बारीन्द्र कलकत्ता लौटे । उनका संपर्क यतीन्द्रनाथ मुखर्जी से बना और उनके साथ क्रांतिकारी समूहों को संगठित करना शुरू किया । बंगाल में 1903 में एक व्यायाम शाला स्थापित हुई । कहने केलिये यह व्यायाम शाला थी । पर यह क्रातिकारियों के मिलने और उन्हे शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण देना मुख्य काम था । बारिन घोष ने यह काम अपने हाथ में लिया और अनेक युवकों को प्रशिक्षित किया । इसके साथ ही  विभिन्न क्राँतिकारी टोलियों को मिलाकर अनुशीलन समिति का गठन भी हुआ इसमें मुख्य भूमिका बारिन घोष की थी । अनुशीलन समिति के अध्यक्ष प्रमथ नाथ मित्र बने । चित्तरंजन दास व अरविन्द घोष उपाध्यक्ष एवं सुरेन्द्रनाथ ठाकुर कोषाध्यक्ष बने । कार्यकारिणी में एकमात्र सिस्टर निवेदिता थीं। 1906 में इसका पहला सम्मलेन कलकत्ता में  हुआ। जिसमें क्रांति के लिये नोजवानों को मानसिक और शारीरिक तैयार करने का निर्णय हुआ । कार्य की सुविधा के लिए अनुशीलन समिति ने एक और कार्यालय ढाका में शुरु किया ।  जिसका नेतृत्व पुलिनबिहारी दास और पी. मित्रा को सौंपा गया ।  इस संस्था की लगभग पाँच सौ शाखाएं खड़ी हो गई थी । जिनमें अधिकांश सदस्य स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी थे । 

वारींद्र घोष ने 1905 में क्रांति से सम्बंधित "भवानी मंदिर " नामक पहली किताब लिखी। इसमें "आनन्द मठ" का भाव था और क्रांतिकारियों को सन्देश दिया गया था की वह स्वाधीनता पाने तक सात्विक जीवन अपनायें। 

वारीन्द्र ने 1907 में दूसरी पुस्तक " वर्तमान रणनीति " लिखी । इसमें कहा गया था कि भारत की आजादी के लिए सैन्य शिक्षा और युद्ध आवश्यक है।

बारिन और बाघा जतिन ने क्रान्ति के लिये बंगाल में अनेक युवाओं को तैयार किया ।

30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किंग्स्फोर्ड की हत्या का प्रयास किया जिसके फलस्वरूप पुलिस ने बहुत तेजी से क्रांतिकारियों की धर-पकड़ शुरू कर दी और 2 मई 1908 को बारिन घोष भी अपने साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर "अलीपुर बम केस" चलाया गया और फाँसी की सजा दी गयी परन्तु अपील के बाद बाद में आजीवन कारावास में बदलकर अण्डमान जेल में भेज दिया गया । यह जेल इतनी कठोर थी कि इसे कालापानी कहा जाता था । जहाँ बारिन 1920 तक बन्दी रहे। 1920 में प्रथम विश्वयुद्ध के संदर्भ राजनैतिक बंदियों को रिहा किया गया । इसमें बारिन घोष की भी रिहाई हो गई। रिहा होकर कलकत्ता आये और आश्रम बना कर रहने लगे । 1923 में वह पांडिचेरी गए जहाँ उनके बड़े भाई श्री अरविन्द आध्यात्मिक आश्रम बनाकर रहने लगे थे । बारिन भी इस आश्रम में रहकर साधना करने लगे । ठाकुर अनुकुलचंद उनके गुरु बने । इन्ही ने ही अपने अनुयायियों द्वारा बारीन्द्र की सकुशल रिहाई में मदद की थी। 1929 में 'बारिन' दोबारा कलकत्ता आये और पत्रकारिता शुरू कर दी। 1933 में उन्होंने "द डान ऑफ इण्डिया नामक अंग्रेजी साप्ताहिक पत्र शुरू किया। फिर सुप्रसिद्ध समाचारपत्र "द स्टेट्समैन से जुड़ गये । स्वतंत्रता के बाद वे बांगला दैनिक "दैनिक बसुमती" के संपादक हो गए। फिर जीवन की अंतिम श्वांस तक उन्होंने पत्रकारिता ही की । उनके आलेख मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक संतुलन का संदेश देते थे । अंततः 18 अप्रैल 1959 को इस संसार से विदा ली । इस प्रकार एक क्राँतिकारी महानायक चिंतक विचारक शाँत हो गया । उनकी स्मृतियाँ कृतियाँ आज भी युवाओं की प्रेरणा हैं।

लेखक - रमेश शर्मा 


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