प्रसिद्धि स्वतंत्रता सेनानी तथा समाज सुधारक राधा बाई ने एक ओर स्वतंत्रता संग्राम में अनेक जेल यात्राएँ कीं वहीं सामाजिक जागरण विशेषकर वेश्यावृत्ति के लिये विवश की जाने वाली महिलाओं के उत्थान और आत्मनिर्भर बनाने और सामाजिक सम्मान की दिशा में अपना जीवन समर्पित कर दिया ।
राधाबाई महाराष्ट्र की रहने वालीं थीं । उनका पूरा जीवन छत्तीसगढ़ में बीता । वे पेशे से नर्स थीं लेकिन अपने पूरे परिवेश में डाक्टर राधाबाई के नाम से प्रसिद्ध थीं। वे 1930 से स्वतंत्रता के लिये किये जाने वाले अहिसंक आँदोलन से जुड़ीं और उन्होंने 1942 तक हर 'सत्याग्रह' में भाग लिया एवं जेल गईं।
राधाबाई का जन्म 1875 को महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ था । तिथि का उल्लेख नहीं मिलता । जब वे मात्र नौ वर्ष की थीं तब 1884 में उनका बाल विवाह हो गया था। पर उनका दाम्पत्य जीवन नहीं चल सका । उनकी पहली विदा होने से पहले ही पति की मृत्यु हो गई। किसी बीमारी में माता पिता की भी मृत्यु हो गई। उनका पालन पोषण पड़ौसिन ने किया । समय के साथ परिश्रम आरंभ किया और दाई का काम सीखा । समय के साथ प्राकृतिक जड़ी बूटियों से उपचार करना भी सीख लिया । वे गर्भस्थ महिलाओं की छोटी मोटी समस्याओं का उपचार जड़ी बूटियों से कर देतीं थीं और उनके साथ के प्रसव भी सफल होते । इसलिये अपने आसपास डाक्टर राधाबाई के नाम से प्रसिद्ध हो गईं।
वे 1918 में रायपुर आईं और नगरपालिका में दाई का काम करने लगीं। प्रसव पीड़िताओं के साथ उनका व्यवहार, गुणवत्ता के कारण वे बहुत लोकप्रिय हो गईं।
सन 1920 में महात्मा गाँधी पहली बार रायपुर आये, गाँधी जी सभा हुई । वे सभा सुनने गईं और आँदोलन से जुड़ गईं। तब से राधाबाई ने हर प्रभात फेरी और सभाओं में न केवल भाग लेतीं अपितु प्रचार कार्य में जुड़ गई। 1930 में पहली बार गिरफ्तार हुईं और इसके बाद उन्होंने 1942 तक हर सत्याग्रह भाग लिया । अनेक बार जेल गईं।
स्वतंत्रता आँदोलन के साथ उन्होंने दो अभियान चलाये एक अस्पृश्यता निवारण का और दूसरा कामगारों की बस्ती में सफाई अभियान । वे सफाई कामगारों की बस्ती में जाती और स्वयं केवल सफाई ही नहीं करतीं थीं अपितु उनके बच्चों को नहलाने और पढ़ाने का काम भी करतीं थीं। उन्होंने उन बस्तियों में ही ऐसे कार्यकर्ता तैयार किये जो सफाई और बच्चों को शिक्षा देने का कार्य करने लगे । वे केवल रायपुर नगर तक ही सीमित न रहीं। एक टोली बनाकर आसपास भी जातीं। उन्होने धमतरी तहसील के अंतर्गत कंडेल गाँव में एक चरखा केन्द्र भी खोला । चरखा वे स्वयं भी चलातीं और चरखे से खादी तैयार कर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम करतीं । उन्होने चरखा पर अनेक गीत तैयार किये तथा चरखा चलाने के साथ सब के साथ गीत भी गातीं "मेरे चरखे का टूटे न तार, चरखा चालू रहे।" चरखा सिखाने के लिये उन्होने एक टोली भी तैयार की जिसमें पार्वती बाई, रोहिणी बाई, कृष्ण बाई, सीता बाई, राजकुँवर बाई आदि थीं। ये सभी महिलाएँ 1942 के भारत छोड़ो आँदोलन में जेल भी गईं।
उन दिनों छत्तीसगढ़ में महिलाएँ ब्लाउज नहीं पहनतीं थीं। जबकि महाराष्ट्र विशेषकर नागपुर में पहना जाता था । राधाबाई ने महिलाओं को ब्लाउज पहने के लिये प्रेरित किया । उन्हे अपने समय के सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित सुन्दर लाल की पत्नि की पत्नि श्रीमती बोधनी बाई का साथ मिला और महिलाओं में जाग्रति अभियान तेज चलने लगा ।
उन दिनों छत्तीसगढ़ में एक प्रथा 'किसबिन नाचा' थी । यह एक प्रकार की वेश्यावृत्ति थी राधाबाई ने इस प्रथा के उन्मूलन का काम आरंभ किया । राधाबाई ने इस पृथा के उन्मूलन की शुरुआत 1944 से आरंभ की थी और अपने जीवन की अंतिम श्वाँस तक करती रहीं। वस्तुतः छत्तीसगढ़ के गाँवों और नगरों में एक सामंती प्रथा थी जिसमें नृत्य के लिये जो महिलाएँ आतीं थीं उनका शारीरिक शोषण भी होता था । इसे "किसबिन नाचा" कहा जाता था। "किसबिन नाचा" करने वालों का एक वर्ग ही बन गया था । जैसे राजस्थान और मालवा में कभी बाछड़ा वर्ग हुआ करता था । वैसे ही छत्तीसगढ में यह किसबिन नाचा वर्ग बन गया था । इस वर्ग के लोग अपने ही परिवार की लड़कियों को 'किसबिन नाचा' के काम में लगा देते थे । इस वर्ग की लड़कियाँ भी मानों यही काम अपनी नियति समझती थीं। राधाबाई और उनकी टोली ने इस प्रथा को समाप्त करने का अभियान चलाया । इसकी शुरुआत खरोरा नामक गाँव से हुई । महिलाओं को चरखा चलाने के काम में लगाया और पुरुषों को खेती-बाड़ी के काम में। यह परिवर्तन राधाबाई के कारण ही संभव हुआ । इसके लिये स्वतंत्रता के बाद राधा बाई का सम्मान किया गया । अपना पूरा जीवन समाज और राष्ट्र को समर्पित करने वाली राधाबाई का निधन 2 जनवरी,1950 को हुआ । वे अकेली रहतीं थीं। उन्होंने जीवन काल में अपना मकान अनाथालय को देने की बसीयत कर दी थी । उनके निधन के बाद उनकी बसीयत के अनुसार उनका मकान एक अनाथालय को दे दिया गया ।
"छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम की दाई माँ : विस्मृत वीरांगना डॉ. राधाबाई"
(आज 2 जनवरी को पुण्यतिथि पर सादर समर्पित है)
"इतिहास के पन्नों से ओझल अद्भुत एवं अद्वितीय वीरांगना डॉ.राधाबाई वो महान् स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और समाज सुधारक हैं जिन्होंने चिकित्सा शास्त्र में डिग्री नहीं ली बावजूद इसके उन्हें डॉ. की जन उपाधि मिली"। दुर्भाग्य देखिए की गाँधी जी ने भी कभी इस वीरांगना का न उल्लेख किया और न ही कभी रेखांकित किया। डॉ. राधाबाई का जन्म सन् 1875 में
नागपुर, महाराष्ट्र में हुआ था,और मृत्यु 2 जनवरी, सन् 1950 में हुई।
प्रसिद्ध महिला स्वतंत्रता सेनानी तथा समाज सुधारकों में से एक थीं। गाँधी जी के सभी आंदोलनों में आगे रहीं। कौमी एकता, स्वदेशी, नारी-जागरण, अस्पृश्यता निवारण, शराबबंदी, इन सभी आन्दोलनों में उनकी भूमिका बहुत ही महत्त्वपूर्ण रही। समाज में प्रचलित कई कुप्रथाओं को समाप्त करने में भी राधाबाई का योगदान अविस्मरणीय है।
राधाबाई का जन्म नागपुर, महाराष्ट्र में सन् 1875 ई. में हुआ था। उनका बहुत कम आयु में ही बाल विवाह हो गया था। जब वे मात्र नौ वर्ष की ही थीं, तभी विधवा हो गईं। पड़ोसिन के घर में उन्हें प्यारी-सी सखी मिली, जिसके साथ वे रहने लगीं। उसी के साथ वे हिन्दी सीखने लगीं और साथ ही दाई का काम भी करने लगीं थीं। लेकिन पड़ोसिन सखी भी एक दिन चल बसी। उसके बेटा-बेटी राधाबाई के भाई-बहन बने रहे। किसी को पता भी नहीं चलता था कि वे दूसरे परिवार की हैं।
सन 1918 में राधाबाई रायपुर आईं और नगरपालिका में दाई का काम करने लगीं। इतने प्रेम और लगन से वे अपना काम करतीं कि सबके लिए माँ बन गई थीं। जन उपाधि के रूप में राधाबाई डॉ. कहलाने लगी थीं। उनके सेवाभाव को देखकर नगरपालिका ने उनके लिए तांगे -घोड़े का इन्तजाम किया था।
सन् 1920 में जब गाँधी जी पहली बार रायपुर आये, तो डॉ. राधाबाई उनसे बहुत प्रभावित हुईं। सन् 1930 से 1942 तक हर एक सत्याग्रह में वे भाग लेती रहीं। न जाने कितनी ही बार वे जेल गई थीं। जेल के अधिकारी भी उनका आदर करते थे।
अस्पृश्यता के विरोध में राधाबाई ने बहुत ही महत्त्वपूर्ण काम किया था। सफ़ाई कामगारों की बस्ती में वे जाती थीं और बस्ती की सफ़ाई किया करती थीं। उनके बच्चों को बड़े प्रेम से नहलाती थीं। उन बच्चों को पढ़ाती थीं। डॉ. राधाबाई धर्म-भेद नहीं मानती थीं। सभी धर्म के लोग उनके घर में आते थे।
समाज सुधार कार्य
जब महात्मा गाँधी 1920 में पहली बार रायपुर आये, उस वक्त धमतरी तहसील के कन्डेल नाम के गाँव में किसान सत्याग्रह चल रहा था। गाँधीजी का प्रभाव छत्तीसगढ़ में व्यापक रूप से पड़ा था। डॉ. राधाबाई तब से गाँधीजी द्वारा संचालित सभी आन्दोलनों में आगे रहीं। उस समय रोज़ प्रभातफेरी निकाली जाती थी। खादी बेचने में, चरखा चलाने में महिलाएँ आगे रहती थीं। महिलाएँ जो एकादशी महात्म्य सुनने के लिये आतीं, वे सब देशहित के बारे में चर्चा करने लगती थीं। डॉ. राधाबाई वहीं चरखा सिखाने बैठ जाती थीं। सब मिलकर गाती- "मेरे चरखे का टूटे न तार, चरखा चालू रहे।" ऐसा करते हुए वे अलग-अलग जगह घूमतीं। उनका मकान जो मोमिनपारा मस्जिद के सामने था, वहाँ और भी बहनें एकत्रित होती थीं- पार्वती बाई, रोहिणी बाई, कृष्ण बाई, सीता बाई, राजकुँवर बाई आदि।
चरखा कातने के बाद वे प्रभातफेरी निकालतीं। सत्याग्रह की तैयारी करतीं, सफाई टोली निकालतीं, पर्दा प्रथा रोकने की कोशिश करतीं, सदर बाज़ार का जगन्नाथ मन्दिर बनता सत्याग्रह स्थल। सब जाति की बहनें पर्दा प्रथा के विरुद्ध भाषण देतीं। मारवाड़ी समाज की महिलाएँ जो पर्दा प्रथा के कारण अपने-आप में घुटन महसूस करतीं, वे पूरी कोशिश करतीं इस प्रथा को ख़त्म करने की। छत्तीसगढ़ में पर्दा प्रथा नहीं थी। ब्लाउज़ पहनने की प्रथा भी नहीं थी। अगर कोई पहनती, तो कहा जाता कि नाचने वाली की पोशाक पहन रखी है। पण्डित सुंदरलाल शर्मा की पत्नी श्रीमती बोधनी बाई ने उनकी प्रेरणा से सबसे पहले ब्लाउज़ पहनना शुरू किया था। धीरे-धीरे सभी महिलाओं ने ब्लाउज़ पहनना शुरू कर दिया।
'किसबिन नाचा' का अंत अविस्मरणीय गाथा है।
डॉ. राधाबाई का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण काम था "वेश्यावृत्ति में लगी बहिनों को मुक्ति दिलाना"। उस समय छत्तीसगढ़ के गाँवों और शहरों में सामंतों के यहाँ वेश्याओं का नाच हुआ करता था, जिसमें 'देवदासी प्रथा' और 'मेड़नी प्रथा' प्रमुख थी, इसे छत्तीसगढ़ी भाषा में "किसबिन नाचा" कहा जाता था। छत्तीसगढ़ के कई स्थानों पर यदा-कदा आज भी यह प्रथा जारी है। "किसबिन नाचा" करने वालों की अलग एक जाति ही बन गई थी। ये लोग अपने ही परिवार की कुँवारी लड़कियों को 'किसबिन नाचा' के लिये अर्पित करने लगे थे। डॉ. राधाबाई के साथ सभी ने इस प्रथा का विरोध किया और इस प्रथा को खत्म किया। खरोरा नाम के एक गाँव में इस प्रथा की समाप्ति सबसे पहले हुई थी। यहाँ के लोग खेती-बाड़ी करने लगे थे। यह अनोखा परिवर्तन राधाबाई के कारण ही सम्भव हुआ था।2 जनवरी, 1950 को डॉ. राधाबाई 75 वर्ष की आयु में देवलोक गमन हुआ।
-रमेश शर्मा
