आज हम स्वतंत्र हैं। सार्वजनिक रूप से कुछ भी कह लेते हैं, लिख लेते हैं लेकिन स्वतंत्रता के पहले ब्रिटिश शासनकाल में देशप्रेम की बातें करना या देशभक्ति पर कुछ लिखना दंडनीय अपराध हुआ करता था। इन सब का विरोध करने के लिए ,भारत के अनेक अंचलों से विद्रोह की चिंगारी विराट रूप धारण करने लगी।जिसमे छत्तीसगढ़ भी इसे अछूता नहीं रहा।
वर्ष 1818 में बस्तर के अबूझमाड़ इलाके में गैंद सिंह के नेतृत्व में आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। वर्ष 1857 से छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत हो गयी थी । सोनखान के जमींदार वीरनारायण सिंह ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का ऐलान किया था। तत्पश्चात अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपने प्राणों को हथेली में रख कर इस महासंग्राम में भाग लिया । स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों का कोड नाम हुआ करता था |यह उस समय की जरूरत थी | वर्ष 1930 में जब महात्मा गांधी ने आंदोलन शुरू किया तो रायपुर में इसका नेतृत्व पांच व्यक्तियों को दिया गया | इन पांचों का कोड वर्ड था पांच पांडव। जिनमे वामनराव लाखे, मौलाना रऊफ, महंत लक्ष्मीनारायण दास और शिवदास डागा और उनके साथ ही एक नाम थे ठाकुर प्यारेलाल सिंह जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |
ठाकुर प्यारेलाल सिंह का जन्म 21 दिसंबर 1891 को छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव जिले के ‘दैहान’ नामक ग्राम में हुआ था | उनके पिता का नाम दीनदयाल सिंह और माँ का नाम नर्मदा देवी था |
बचपन से ही सच्चे स्वदेशी, राष्ट्रीय विचारधारक और मेधावी थे | इनकी प्राथमिक शिक्षा राजनांदगांव और रायपुर में हुई | हाई स्कूल की शिक्षा हेतु रायपुर आये 1999 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात नागपुर से बीए की परीक्षा पास की तथा जबलपुर में उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी और फिर 1916 में वकालत की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने वकालत प्रारम्भ कर दी |
पेशे से वकील, ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और छत्तीसगढ़ में श्रमिक आंदोलनों के संस्थापक थे। उन्होंने 1919-1920, 1924 और 1937 में राजनांदगांव रियासत में तीन श्रमिक आंदोलनों का नेतृत्व किया। उन्हें "त्यागमूर्ति" की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया गया, जिसका अर्थ है "बलिदान का प्रतीक"।
1916 में उनकी मुलाकात राजनांदगांव स्थित सूती मिल मजदूरों से हुई। उन्हें पता चला कि ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा श्रमिकों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता था और उन्हें हर दिन 12 घंटे काम करना पड़ता था। उनकी दुर्दशा ने ठाकुर प्यारेलाल को श्रमिकों की मदद के लिए एक संगठन शुरू करने के लिए मजबूर किया। 1909 में उन्होंने राजनांदगांव में सरस्वती पुस्तकालय की शुरुआत की। 1920 में, ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नेतृत्व में राजनांदगांव मिल मजदूरों ने हड़ताल शुरू की जो 37 दिनों से अधिक समय तक चली। यह भारत की पहली दीर्घकालीन हड़ताल थी और यह श्रमिकों के काम के समय को कम करने में सफल रही। महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन शुरू करने के साथ ही उन्होंने अपनी वकालत छोड़ दी और ब्रिटेन से भारत की आजादी के लिए अभियान चलाना शुरू कर दिया। असहयोग आंदोलन के दौरान कई छात्रों ने राज-प्रायोजित पब्लिक स्कूल छोड़ दिए, और कई वकीलों ने अपनी प्रैक्टिस छोड़ दी। इस अवधि के दौरान ठाकुर प्यारेलाल की देख रेख में कई भारतीय राष्ट्रीय विद्यालय स्थापित किए गए, जिनमें राजनांदगांव का माध्यमिक विद्यालय भी शामिल है।
22 अक्टूबर, 1954 को भूटान की यात्रा के समय अस्वस्थ हो जाने कारण ठाकुर प्यारेलाल सिंह का निधन हो गया। छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में सहकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए "ठाकुर प्यारेलाल सिंह सम्मान" स्थापित किया है।
