हिन्दू धर्म में मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का बहुत खास महत्व होता है | उत्पन्ना एकादशी को विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती है | हिन्दू पंचांग के अनुसार हर माह में दो बार एकादशी तिथि पड़ती है | एक कृष्ण पक्ष और दूसरा शुक्ल पक्ष, साल में 24 एकादशी पड़ती हैं | उत्पन्ना एकादशी की एक पौराणिक कथा है –
कथा के अनुसार सतयुग में मुर नाम का एक दैत्य रहता था | वह बहुत शक्तिशाली राक्षस था उस दैत्य ने इंद्रा,आदित्य,वसु,वायु,अग्नि सभी देवताओं को पराजय कर स्वर्ग लोक में अपना आधिपत्य जमा लिया था | तब इंद्रा सहित सभी देवता दैत्य से भयभीत होकर भगवान शंकर के पास जाते है और सारी वृतांत भगवान शंकर को बताते है, देवताओं का वृतांत सुनने के बाद भगवान शिव ने कहा , हे देवताओं! आप सब भगवान विष्णु के शरण में जाइए जो तीनों लोकों के स्वामी है | वे ही तुम्हारे दुखों को दूर कर सकते हैं | शिवजी के कहे अनुसार सभी देवतागण क्षीणसागर पहुंचे और कहा की हे प्रभु हमारे रक्षा करों | दैत्यों ने स्वर्ग लोक को जीतकर अपना आधिपत्य जमा लिया है | आप उन दैत्यों से हमारी रक्षा करें |
देवताओं की बाते सुनकर भगवान विष्णु कहने लगे ऐसा कौन सा मायावी दैत्य है जो देवताओं को जीत लिया , यह सुनकर इंद्र बोले प्राचीन समय में एक नाड़ीजांघ नाम का एक राक्षस था उसका मुर नाम का एक पुत्र था | उसकी चंद्रावती नाम की नगरी है वह स्वर्गलोक पर अपना अधिकार जमा लिया है | यह सुनकर भगवान विष्णु ने सभी देवतओं को चंद्रावती नगरी जाने को कहते है |
उस समय राक्षस मुर युद्ध भूमि में दहाड़ रहा था | तब भगवान श्री हरी युद्ध भूमि में आए और उन्होंने राक्षस मुर से युद्ध किया | उनका ये युद्ध 10 हजार वर्ष तक चलता रहा किन्तु मुर हटा नहीं | तब भगवान विष्णु बद्रिकाश्रम चले गए | वहां हेमवती नाम का एक सुन्दर गुफा था यह गुफा 12 मीटर लंबी थी और उस गुफे का एक ही दरवाजा था | उस गुफा में भगवान विष्णु कुछ दिन आराम करने गए थे वह आराम करते करते भगवान योगनिंद्रा में चले गए |
वही दूसरी तरफ मुर भी भगवान विष्णु के पीछे-पीछे गुफा में आ गया और भगवान विष्णु को सोता हुआ देखकर मारने की सोची , तभी भगवान विष्णु के शरीर से उज्जवल कांतिमय रूप में एक कन्या उत्पन्न हुई , और राक्षस मुर का वध किया | भगवान विष्णु जब अपनी नींद से जाग्रत हुए, तो सब बातों को जानकर उन्होंने उस देवी से कहा कि आपका जन्म एकादशी के दिन हुआ है | अत: आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजी जाएंगी | तभी से उत्पन्ना एकादशी मनाया जाने लगा |
पूजा विधि
उत्पन्ना एकादशी के दिन सूर्योदय के डेढ़ घण्टा पहले का मुहूर्त (ब्रह्म बेला) में उठें और भगवान विष्णु को प्रणाम कर दिन की शुरुआत करें। दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के बाद स्नान-ध्यान करें। अगर सुविधा है, तो गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इस समय आचमन कर व्रत संकल्प लें। अब पीले वस्त्र धारण करें और सूर्य देव को जल का अर्घ्य दें। इसके पश्चात, पूजा गृह में चौकी पर नवीन पीला वस्त्र बिछाकर भगवान की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। अब पंचोपचार कर विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करें। पूजा के समय विष्णु चालीसा का पाठ और मंत्र जाप करें। अंत में आरती कर सुख, समृद्धि और धन वृद्धि की कामना करें। दिन भर उपवास रखें। संध्याकाल में आरती कर फलाहार करें।
