व्यक्ति को उसकी जाति, धर्म से अधिक उसके कर्मों को महत्व देना चाहिए-डॉ. भीमराव अम्बेडकर | The Voice TV

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व्यक्ति को उसकी जाति, धर्म से अधिक उसके कर्मों को महत्व देना चाहिए-डॉ. भीमराव अम्बेडकर

Date : 06-Dec-2023

 अनेक विचारों से भारतीयों के मन में चेतना जगाने वाले संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म  14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में एक दलित परिवार में हुआ था। ऐसे में बचपन से ही उनके मस्तिष्क में समाज में हो रहे भेदभाव, ऊंच नीच और दासता के प्रति क्रांति ने जन्म ले लिया था। जिसके चलते उन्होंने ना केवल समाज से छुआछूत का विरोध किया। बल्कि दलित जाति के उत्थान के लिए भी प्रयास किए।


साथ ही उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत से देश की आज़ादी के लिए स्वतंत्रता आंदोलनों में भी बढ़ चढ़कर प्रतिभाग किया। ऐसे में डॉ. भीमराव आंबेडकर एक सफल राजनीतिज्ञ, विधिवेत्ता, समाजसुधारक और एक अर्थशास्त्री के रूप में प्रसिद्ध हुए। साथ ही उन्हें भारतीय गणराज्य और संविधान निर्माता के तौर पर भी जाना जाता है।

समाज का उद्धार ही मेरा कर्तव्य है- साल 1943 में बाबासाहेब आंबेडकर को जब वायसराय काउंसिल में शामिल किया गया था। उस दौरान उनको श्रम मंत्रालय सौंप दिया गया था। और पी डब्ल्यू डी पर भी बाबासाहेब का ही नियंत्रण था। ऐसे में ठेकेदारों में इस विभाग का ठेका लेने के लिए द्वंद्व मचा पड़ा था।

जिसके चलते दिल्ली के एक नामचीन ठेकेदार ने अपने बेटे को बाबासाहेब के बेटे यशवंत राव से मिलने भेजा। और उनके बेटे के माध्यम से बाबासाहेब से एक पेशकश की। कि यदि बाबासाहेब उन्हें  यह ठेका दिलवा दें, तो वह उन्हें 25-30% तक कमीशन पर उनके साथ साझेदारी करने को तैयार हैं।
जिस पर बाबासाहेब के बेटे उस ठेकेदार की बातों में आकर अपने पिता के पास यह प्रस्ताव लेकर पहुंचते हैं। तो बाबासाहेब बहुत गुस्सा करते हैं, और अपने बेटे को भूखे पेट ही वापस यह कहकर लौटा दिया कि मैं यहां केवल समाज के उद्धार का ही उद्देश्य लेकर आया हूं। केवल अपनी संतान को पालना ही मेरा कर्तव्य नहीं है। और इस तरह के प्रलोभन मेरे उद्देश्य से मुझे पथभ्रष्ट नहीं कर सकते।
जीवन में शिक्षा से बढ़कर कुछ नहीं होता- भीमराव आंबेडकर ने अपने प्रारंभिक जीवन से लेकर अंत समय तक कठिनाइयों का सामना किया। लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी किसी परेशानी को अपनी शिक्षा के बीच नहीं आने दिया।
इतना ही नहीं बाबासाहेब को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। जिसके चलते उनके पास स्वयं की एक लाइब्रेरी थी, जहां 50 हजार से अधिक किताबों का संग्रह हुआ करता था।

संस्कृत भाषा को भारतीय भाषाओं की जननी मानने वाले डॉ. भीमराव आंबेडकर और लाल बहादुर शास्त्री जी के संस्कृत भाषा बीच बातचीत चल रही थी | जिस पर लोग डॉ. भीमराव आंबेडकर की संस्कृत भाषा पर पकड़ को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें संस्कृत भाषा में महारथ हासिल है। 

14 अक्टूबर 1956 को, उन्होंने नागपुर में एक ऐतिहासिक समारोह में बौद्ध धर्म अपना लिया और 06 दिसंबर 1956 को उनकी मृत्यु हो गई। डॉ बाबासाहेब अंबेडकर को 1954 में नेपाल के काठमांडू मेंजगतिक बौद्ध धर्म परिषदमें बौद्ध भिक्षुओं द्वाराबोधिसत्वकी उपाधि से सम्मानित किया गया।

इस प्रकार डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन से हमें यह सीखने को मिलता है कि व्यक्ति को उसकी जाति, धर्म से अधिक उसके कर्मों को महत्व देना चाहिए। और यदि हम भीमराव आंबेडकर के दिखाए गए पदचिह्नों पर चलेंगे, तो जीवन के हर क्षेत्र में सफलता हासिल करेंगे।


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