भोज्यं भोजनशक्तिश्च रतिशक्तिर वरांगना |
विभवो दानशक्तिश्च ना·ल्पस्य तपसः फलम् ||
यहां आचार्य चाणक्य का कथन है कि भोज्य पदार्थ, भोजन–शक्ति, रतिशक्ति, सुंदर स्त्री, वैभव तथा दान-शक्ति, ये सब सुख किसी अल्प तपस्या का फल नहीं होते | अर्थात् सुन्दर खाने-पीने की वस्तुएं मिलें और जीवन के अन्त तक खाने-पचाने की शक्ति बनी रहे | सुंदर स्त्री मिले, धन-संपत्ति हो और दान देने की आदत भी हो | ये सारे सुख किसी भाग्यशाली को ही मिलते हैं, पूर्व जन्म में अखण्ड तपस्या से ही ऐसा सौभाग्य मिलता है |
अक्सर देखने में यह आता है कि जिन व्यक्तियों के पास खाने की कोई कमी नहीं, उनके पास उन्हें खाकर पचाने की सामर्थ्य नहीं होती | आप इसे यूं भी कह सकते हैं कि जिसके पास चने हैं, उसके पास उनका आनंद उठाने के लिए दांत नहीं और जिसके पास दांत हैं, उसके पास चने नहीं | अभिप्राय यह है कि अत्यन्त धनवान व्यक्ति भी ऐसे रोगों से ग्रस्त रहते हैं, जिन्हें साधारण या सादी चीज नहीं पचती, परन्तु जो व्यक्ति खूब हष्ट-पुष्ट हैं, तगड़े हैं, तथा जिनकी पाचनशक्ति भी तेज है, उनके पास अभाव के कारण खाने को ही कुछ नहीं होता | इसी प्रकार बहुत से व्यक्तियों के पास धन-दैलत और वैभव की कोई कमी नहीं होती , परन्तु उनमें उसके उपभोग करने और दान देने की प्रवृत्ति नहीं होती | जिन व्यक्तियों में ये बातें समान रूप से मिलती है, चाणक्य उसे उनके पूर्वजन्म के तप का फल मानते हैं | अर्थात् उनका यह कहना है कि खाने-पीने की वस्तुओं के साथ उन्हें पचाने की शक्ति, सुंदर स्त्री , धन के रहने पर उसका सदुपयोग और दान की प्रवृत्ति जिस व्यक्ति में होती है, वह बहुत भाग्यशाली होता है | इसे पिछले जन्म का सुफल ही मानना चाहिए |
