गुरु नानक जी एक ऐसे नाम हैं, जहाँ हिन्दू और सिख धर्म मिलते हैं। सिख धर्म हिन्दू धर्म से ही बना है जब मुगलों का अत्याचार हिन्दूओ पर बढ़ता जा रहा था तब सनातन धर्म की रक्षा के लिए गुरु गोविन्द सिंह ने कुछ साहसी हिन्दूओ को लेकर समुह बनाया जिसे सिख कहा गया | जिस धर्म को गुरु गोविन्द सिंह जी ने शुरू किया उन्होंने कहा था " सकल विश्व में खालसा पंथ गाजे, जगे धर्म हिंदू तुरक दुंद भाजे " |
यदि किसी को शास्त्र और वेदों का ज्ञान हो तो वह गुरु ग्रंथ साहिब को बेहतर ढंग से समझ सकता है। गुरु नानक जी ने जिस ‘इक ओंकार (ईश्वर एक है) के बारे में जागरूकता फैलाई, ऋग्वेद में उसे ‘एकम् सत विप्रा बहुधा वदंति’ कहा गया। उन्होंने उपदेश दिया ‘एकस के हम बारिक’ (हम एक भगवान की संतान हैं)। उनके दर्शन में घृणा, द्वेष और भेदभाव के लिए कोई गुंजाइश नहीं।
सभी सिख गुरु हिंदू परिवारों में जन्मे और गुरु नानक जी के दिखाए रास्ते पर चले। इस प्रक्रिया में उन्होंने अपना और अपने परिवार का बलिदान दिया, लेकिन सच्चाई और आस्था के मार्ग से नहीं हटे। नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर ने जिस तरह कश्मीरी पंडितों की मदद की थी और इसके लिए औरंगजेब से लड़ गए थे, और उन्हें ‘हिन्द की चादर’ कहा गया और उनके बलिदान को आज भी हम याद करते हैं।
सिख इतिहास को आकार देने और सिख धर्म को परिभाषित करने वाले गुरु गोविन्द सिंह जी का नारा था सवा लाख से एक लड़ाऊं। उनके विचार ‘देह शिवा बर मोहे ईहे, शुभ कर्मन ते कभुं न टरूं’ (मुङो शिव आशीर्वाद दें कि मैं अच्छे कर्म करने से कभी न डरूं) से प्रेरणा पाकर उनके शिष्य मुगलों के खिलाफ निर्भीकता से डटे रहे और सभी ने अपने प्राणों की आहुति देना स्वीकार किया , परन्तु युद्ध के मैदान में दुश्मन को पीठ नहीं दिखाई। यह सिख और हिंदू ही थे| गुरु गोविंद सिंह ने सिखों के लिए पांच चीजें अनिवार्य की थीं - केश, कड़ा, कृपाण, कंघा और कच्छा।
गुरु साहिब जी ने कभी भी हिंदू-सिखों को अलग-अलग नहीं देखा। आज न जाने कैसे तथाकथित विद्वान यह दावा करते हैं कि हिंदू और सिख अलग-अलग थे। सच तो यह है कि प्रत्येक हिंदू परिवार ने एक बेटे को सिख बनाने के लिए दिया ताकि मुगल आक्रांताओं के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सके।
गुरु साहिब की शिक्षाओं का पालन करते हुए पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने बनारस में काशी विश्वनाथ मंदिर में सोने का गुंबद दान किया, जो आज भी चमक रहा है। उन्होंने पुरी के जगन्नाथ मंदिर को कोहिनूर हीरा देने की इच्छा जताई। नानक जी कर्मकांड के खिलाफ थे। उन्होंने ‘माथे तिलक, हाथ में माला पाना, लोगन राम खिलौना जाना’ गाकर अपने विचार लोगों तक पहुंचाए। उन्होंने लोगों को एक किया और भगवान को सरलतम रूपों में वर्णित किया। आज भी करतारपुर साहिब सिख दर्शन करने जाते हैं, जहाँ गुरु नानक अपने शरीर का त्याग करने से पहले 18 वर्षों तक रहे थे। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में दर्शन करने दूर-दूर से हिन्दू व सिख जाते हैं।
