दिल्ली का सीसगंज गुरुद्वारा एक योद्धा के अभूतपूर्व शौर्य की गवाही देता है। ये स्थल नौ ऐतिहासिक गुरुद्वारों में से एक है। गुरुद्वारे की एक-एक दीवार गुरु तेग बहादुर के हौसले और हिम्मत की गाथाएं गुनगुनाती हैं। मानव धर्म की रक्षा में अमिट छाप छोड़ने वाले विशाल हृदय वाले योद्धा ‘गुरु तेग बहादुर’ को ’मानवता का रक्षक’ यूं ही नहीं कहते हैं। धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने हंसते-हंसते अपना सिर धड़ से अलग करवा लिया। सिख समुदाय गुरु तेग बहादुर को ‘श्रीष्ट-दी-चादर’ के रूप में देवताओं की भांति पूजते हैं।
मुगल दौर में जब हिंदुओं का खुलेआम धर्मांतरण किया जा रहा था, गुरु तेग बहादुर को देखा नहीं गया। उन्होंने मुगलों के जुल्मों के खिलाफ खड़े होकर लोहा लिया। लंबी लड़ाई लड़ी, लेकिन आज ही के दिन यानी 24 नवंबर को वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी शहादत को याद कर प्रतिवर्ष यह दिन शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
दरअसल, सिख धर्म छोड़ कर इस्लाम स्वीकार करने के लिए मुगल शासक औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर को तमाम यातनाएं दी। कई दिनों तक भूखे रखा, बंदी बनाकर सैनिकों द्वारा टॉर्चर करवाया। लेकिन गुरु तेग बहादुर ने उनकी एक न सुनी। अंत में उन्होंने धर्म परिवर्तन की बजाय शहादत को चुना। अखंड भारत के महान योद्धा को 24 नवंबर, 1675 को औरंगजेब ने फांसी दे दी। फांसी का स्थान दिल्ली के चांदनी चौक का गुरुद्वारा सीसगंज साहिब है। पहली बार 1783 में राजा बघेल सिंह द्वारा 9वें सिख गुरु तेग बहादुर की शहादत स्थल की याद में बनाया था। हालांकि उससे पहले भी यह गुरुद्वारा था। बाद में यह बहुत बड़े गुरुद्वारे में तब्दील हुआ।
वह शख्सियत नहीं, विराट संस्थान थे। उन्हें महान शिक्षक के रूप में भी जाना जाता था। उत्कृष्ट योद्धा, विचारक और कवि तो थे ही। आध्यात्मिक बातों के अलावा ईश्वर, मन, शरीर और शारीरिक जुड़ाव के स्वरूप का भी उन्होंने विस्तृत वर्णन किया। वह अच्छे रचनाकार भी थे। उनकी रचना को 116 काव्य भजनों के रूप में पवित्र ग्रंथ ’गुरुग्रंथ साहिब’ में शामिल किया गया है। इसके अलावा भी उनके जीवन से कई अध्याय जुड़े थे। वह एक उत्साही यात्री भी थे और उन्होंने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचार केंद्र स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसा ही एक मिशन उन्होंने पंजाब में चक-ननकी शहर की स्थापना की, जो बाद में पंजाब के आनंदपुर साहिब का हिस्सा बना।
गुरु तेग बहादुर का संपूर्ण जीवन अद्भुत कहानियों से भरा रहा। उनके शुरुआती जीवन की जहां तक बात है तो उन्होंने अपने साहस का जौहर तब से ही दिखाना आरंभ कर दिया था। श्री गुरु हरगोबिंद की ओर से लड़ी गई करतारपुर के युद्ध में भी गुरु तेग बहादुर ने अपनी तलवार से अभूतपूर्व शौर्य से सबको चकित कर दिया था। तब उनकी आयु मात्र 13 वर्ष थी। कम लोग ही जानते होंगे तब संसार उन्हें गुरु तेग बहादुर के नाम से नहीं, बल्कि ‘त्याग मल’ के नाम से जानता था। करतारपुर लड़ाई के बाद वह ‘त्याग मल’ से तेग बहादुर बने।
गुरु तेग बहादुर का बलिदान इस बात का उद्घोष था कि मानव को अपनी आत्मा की आवाज एवं विश्वास के अनुसार जीने का अधिकार है। उनका जीवन आज भी हमें अच्छे रास्तों पर चलने को प्रेरित करता है। उन्होंने हमेशा इस बात का प्रचार किया कि अन्याय के खिलाफ सभी को बढ़कर लड़ना चाहिए।
(लेखक, डॉ. रमेश ठाकुर)
