यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी |
विभवे यस्य संतुष्टिस्तस्य स्वर्ग इहैव हि ||
आचार्य चाणक्य का कथन है कि जिसका पुत्र वशीभूत हो, पत्नी वेदों के मार्ग पर चलने वाली हो और जो अपने वैभव से संतुष्ट हो, उसके लिए यहीं स्वर्ग है |
अभिप्राय यह है कि जिस मनुष्य का पुत्र आज्ञाकारी होता है, सब प्रकार से कहने में होता है पत्नी धार्मिक और उत्तम चाल-चलन वाली होती है, सदगृहिणी होती है तथा जो अपने पास जितनी भी धन-संपत्ति है, उसी में खुश रहता है, संतुष्ट रहता है, ऐसे व्यक्ति को इसी संसार में स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है | उसके लिए पृथ्वी में ही स्वर्ग हो जाता है |
क्योंकि पुत्र का आज्ञापालक होना, स्त्री का पतिव्रता होना और मनुष्य का धन के प्रति लोभ-लालच न रखना अथवा मन में संतोष बनाए रखना ही स्वर्ग के मिलनेवाले सुख के समान है | ऐसा विश्वास किया जाता है कि स्वर्ग अनेक शुभ अथवा पुण्य कार्यो के अर्जित करने से ही प्राप्त होता है | उसी प्रकार इस संसार में ये तीनों सुख भी मनुष्य को पुण्य कर्मो के सुफल रूप ही प्राप्त होते हैं | जिस व्यक्ति को ये तीनों सुख प्राप्त हों, उसे बहुत भाग्यशाली समझना चाहिए |
