कार्तिक माह की षष्टि तिथि को मनाया जाता है छठ पर्व, यह त्योहार मुख्य रूप से एक हिन्दू त्योहार है, यह अनुष्ठान जिसमें चार दिनों के लिए मुख्य घर से उपासक के संयम और अनुष्ठान अलगाव की अवधि का पालन किया जाता है। इस अवधि के दौरान, उपासक अनुष्ठानिक शुद्धता का पालन करता है |
मुख्य उपासक, जिन्हें परवैतिन कहा जाता है (संस्कृत पर्व से, जिसका अर्थ है 'अवसर' या 'त्यौहार'), आमतौर पर महिलाएं होती हैं। परवैतिन अपने परिवार की खुशहाली, समृद्धि और संतान के लिए प्रार्थना करती हैं |
छठ की पूर्व संध्या पर, घरों के साथ-साथ , आस-पास की भी अच्छी तरह से सफाई की जाती है। त्योहार के पहले दिन, उपासक पारंपरिक भोजन पकाती है और इसे सूर्य देव को अर्पित करती है। इस दिन को नहा-खा कहा जाता है (शाब्दिक रूप से, 'नहाना और खाना')। इस दिन उपासक स्वयं के द्वारा तैयार किये हुए भोजन को एक बार ग्रहण करने की अनुमति देती है।
दूसरे दिन, एक विशेष अनुष्ठान, जिसे खरना कहा जाता है , यह शाम को सूर्यास्त के बाद किया जाता है। इस दिन भी, उपासक इस अनुष्ठान में सूर्य देव को चढ़ाए गए प्रसाद से ही अपना भोजन करती है। इस दिन अनुष्ठान का प्रसाद बांटने के लिए मित्रों और परिवार को घर में निमंत्रण दिया जाता है क्यूंकि वर्तमान दिन से अगले 36 घंटों तक उपासक निर्जला व्रत रहती है |
अगले दिन की शाम को पूरा घर उपासक के साथ अनुष्ठान स्नान और सूर्य देव की पूजा के लिए नदी के तट पर जाते है, इस अवसर पर माताओं और बेटियों द्वारा क्षेत्रीय लोकगीत गाया जाता है । स्नान की यही परंपरा अगले दिन भोर होते ही दोहराई जाती है। यह तब होता है जब उपासक अपना उपवास तोडती है और अनुष्ठान पूरा करती है। नदी तट पर भोर के समय मनाया जाने वाला छठ आधुनिक भारतीय को उनकी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने वाला एक सुंदर, उत्साहवर्धक आध्यात्मिक अनुभव है।
छठ पूजा की एक पौराणिक कथा है –
पौराणिक कथा के अनुसार राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी मालिनी निसंतान थे | इस बात से राजा और दुखी रहते थे | एक दिन उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप से पुत्र प्राप्ति के लिए एक यज्ञ करवाया था | राजा रानी के कहे अनुसार महर्षि ने यज्ञ प्रारंभ किया ,यज्ञ के संपन्न होने के बाद महर्षि ने प्रसाद के रूप में मालिनी को खीर ग्रहण करने को दिया |मालिनी ने खीर को ग्रहण किया जिससे वह गर्भवती हो गई तथा नौ महीने बाद रानी को एक पुत्र की प्राप्ति होती है परंतु दुर्भाग्यवश रानी का पुत्र मृत पैदा हुआ | यह देखकर राजा रानी बहुत दुखी हो जाते है और निरशवश वह दोनों आत्महत्या करने की सोचते है किन्तु जैसे ही वह आत्महत्या करने लगते है तब उसनके समीप छठी माता (देवसेना) प्रकट होती है और कहती है मै छठी देवी हूँ , मैं लोगो को पुत्र सुख का वरदान प्रदान करती हूँ | जो भी मनुष्य मेरी सच्ची मन से पूजा अर्चना करते है मैं उनकी सभी मनोकामना पूर्ण करती हूँ | माता छठी राजा से कहती है कि यदि तुम मेरी विधि - विधान से पूजा करोगे तो मैं तुम्हे पुत्र रत्न का वरदान दूंगी| देवी के कहे अनुसार राजा प्रियव्रत ने कार्तिक शुल्क की छठी तिथि को व्रत विधि विधान से सम्पूर्ण किया जिससे व्रत के प्रभाव से रानी एक फिर गर्भवती हुई और नौ महीने बात उनको पुत्र की प्राप्ति होती है |
पूजा विधि
पूजन के दिन सबसे पहले उपासक को स्नानादि से निवृत हो जाना चाहिए।इसके बाद भगवान सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए।के समय मिट्टी के चूल्हे पर साठी के चावल, गुड़ और दूध की खीर बनाना चाहिए।भोग को सबसे पहले छठ माता को अर्पित करना चाहिए।अंत में व्रती को प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।इस दिन एक समय ही भोजन का विधान है।दिन से ही 36 घंटे के लिए निर्जला व्रत की शुरुआत हो जाती है। छठ पूजा के चौथे दिन भोर में अर्घ्य देकर इस व्रत का समापन किया जाता है।
