एक हाथी था | वह एक गांव में रहता था | उसके मालिक नौकर उसे सुबह-सुबह जंगल में ले जाता | नौकर एक पेड़ नीचे बैठ जाता | हाथी दिनभर अपना पेट भरता रहता | वह सूंड़ से पेड़ों की टहनियां तोड़-तोड़कर खाता रहता | कभी-कभी तो वह पूरा पेड़ ही उखाड़ फेंकता था | दिनभर खाने के बाद भी हाथी का पेट नहीं भरता था | शाम को दोनों घर वापस लौट आते थें |
हाथी जिस रास्ते से गुजरता था | उस रास्ते में एक दर्जी की दुकान थी | उस दर्जी को हाथी पसंद था | वह हाथी के पास जाना चाहता था | दर्जी मन-ही-मन सोचते रहता था- 'मेरा भी एक हाथी होता तो कितना अच्छा होता | यह हाथी मुझे अपनी सूंड़ से उठाकर अपनी पीठ पर बिठा ले तो कितना अच्छा होगा| हाथी तो वह खरीद नहीं सकता | हाथी उसका दोस्त बन जाये तो अच्छा होगा |'
अगली सुबह हाथी उसकी दुकान के पास आया| दर्जी ने हाथ आगे बढ़ाया,उसके हाथ में एक रोटी थी | हाथी ने अपनी सूंड़ बढ़ाई, सूंड़ में रोटी पकड़ी और अपने मुंह में डाल ली | दर्जी को बहुत अच्छा लगा | वह रोज हाथी को एक रोटी देता | हाथी रोज उसी दुकान पर आता और अपनी सूंड़ उसी दुकान को ओर बढ़ाता और रोटी लेता हुआ चला जाता | हाथी उसका दोस्त बन गया |
एक दिन दर्जी बीमार पड़ गया | उसकी जगह दुकान पर उसका बेटा बैठा हुआ था | रोज की तरह हाथी आया, उसने अपनी सूंड़ दुकान की ओर बढ़ाई | दर्जी का लड़का डर गया | उसकी हाथ में सुई थी | उसने हाथी की सूंड़ में सुई चुभो दी | हाथी चिंघाड़ा उसने अपनी सूंड़ पीछे हटा ली | हाथी आगे बढ़ गया | शाम को हाथी लौटा | वह दुकान के सामने रुका | दर्जी का लड़का हाथी को देख रहा था | उसने हाथी को देखकर सुई उठा ली | हाथी ने अपनी सूंड़ दुकान की ओर बढ़ाई | दर्जी का लड़का भी तैयार था | उसने सुई आगे बढ़ाई | हाथी नहीं डरा | दर्जी के लड़के ने सुई और आगे बढ़ाई | हाथी ने सुई चुभने से पहले ही सूंड़ में भरा कीचड़ पूरी दुकान में बिखेर दिया | दर्जी की दुकान में टंगे कपड़े कीचड़ में सन गए |
दर्जी को इसका पता चला | वह दुकान पर आया | उसने दुकान में कीचड़ देखा | उसे बड़ा दुःख हुआ | उसने अपने बेटे से कहा -''जानवरों से तुम प्यार करोगे, तो जानवर भी तुमसे प्रेम करेगा |''
