हिन्दी संसार के सर्वश्रेष्ठ प्रगतिशील कवि गजानन माधव 'मुक्तिबोध’ एकनिष्ठ संघर्ष, अटूट सच्चाई और नई दृष्टि के रूप में हमारी भावनाओं के केंद्रीय मंच पर वर्तमान मे भी केन्द्रीत हैं | हिन्दी साहित्य के प्रमुख कवि के साथ-साथ कुशल आलोचक, निबंधकार, कहानीकार तथा उपन्यासकार भी थे | मुक्तिबोध के अग्रलिखित पंक्ति के आधार पर प्रगतिशील कविता और नयी कविता के मध्य ‘सेतु’ के रूप में ख्याति विख्यात हैं -
मुझे क़दम-क़दम पर,चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए ! एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,व मैं उन सब पर से गुज़रना चाहता हूँ,
बहुत अच्छे लगते हैं,उनके तज़ुर्बे और अपने सपने...
सब सच्चे लगते हैं,अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,जाने क्या मिल जाए !
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में,चमकता हीरा है,
हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है,
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में,महाकाव्य पीड़ा है,
पलभर में सबसे गुज़रना चाहता हूँ,प्रत्येक उर में से तिर जाना चाहता हूँ,
इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ,अजीब है ज़िन्दगी !
बेवकूफ़ बनने के ख़ातिर ही,सब तरफ़ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ,
और यह सब देख बड़ा मज़ा आता है,कि मैं ठगा जाता हूँ...
हृदय में मेरे ही,प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है
हँस-हँसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,
कि जगत्...स्वायत्त हुआ जाता है,कहानियां लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते,जहाँ ज़रा खड़े होकर
बातें कुछ करता हूँ,...उपन्यास मिल जाते।
कविताकार के साथ-साथ वें कुशल निबंधकार, आलोचनाकार, इतिहास विधाओं में साहित्य सृजन करने का श्रेय प्राप्त हैं |
प्रमुख कहानियां व रचनाएँ
अंधेरे में, काठ का सपना, क्लॉड ईथरली, जंक्शन, पक्षी और दीमक, प्रश्न, ब्रह्मराक्षस का शिष्य, लेखन, अँधेरे में, मैं तुम लोगों से दूर हूँ, चाँद का मुँह टेढ़ा है, ब्रह्मराक्षस, मैं उनका ही होता, पक्षी और दीमक हैं |
इनका जन्म 13 नवंबर 1917 को श्योपुर (शिवपुरी) जिला मुरैना, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में हुआ था । पिता का नाम माधवराव और माता का नाम पार्वती बाई था । पिता पुलिस में अधिकारी थे, तो बचपन बड़े ही ठाठ-बाट में बीता। पर बाद में इन्हें जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ा । इनकी प्रारम्भिक शिक्षा उज्जैन मे हुई |
साल 1940 से 1958 तक उन्होंने कई छोटी-बड़ी नौकरियाँ की। कभी वे शिक्षक लगे तो कभी पत्रकारिता और सम्पादन किया। 1942 के आसपास वे वामपंथी विचारधारा की ओर झुके और शुजालपुर में रहते हुए उनकी वामपंथी चेतना मजबूत हुई।
साल 1953 में उन्होंने साहित्य लेखन शुरू किया । “नौकरियाँ पकड़ता और छोड़ता रहा। शिक्षक, पत्रकार, पुनः शिक्षक, सरकारी और ग़ैर सरकारी नौकरियाँ।
निम्न-मध्यवर्गीय जीवन, बाल-बच्चे, जन्म-मौत में उलझा रहा ।”
मुक्तिबोध तारसप्तक के पहले कवि थे । मनुष्य की अस्मिता, आत्मसंघर्ष और प्रखर राजनैतिक चेतना से समृद्ध उनकी कविता पहली बार ‘तार सप्तक’ के माध्यम से सामने आई, लेकिन उनका कोई स्वतंत्र काव्य-संग्रह उनके जीवनकाल में प्रकाशित नहीं हो पाया ।
अंतत: साल 1958 से दिग्विजय महाविद्यालय, राजनाँदगाँव में प्राध्यापक नियुक्त हुए, जिस पर उन्होंने लिखा,
शिक्षक, पत्रकार, पुनः शिक्षक, सरकारी और ग़ैर सरकारी नौकरियाँ।
निम्न-मध्यवर्गीय जीवन, बाल-बच्चे, दवादारू, जन्म-मौत में उलझा रहा।”
मुक्तिबोध की रुचि अध्ययन-अध्यापन, पत्रकारिता, समसामयिक राजनीतिक एवं साहित्य के विषयों पर लेखन में थी । आजीवन ग़रीबी से लड़ते हुए और रोगों का मुकाबला करते हुए 11 सितम्बर, 1964 को नई दिल्ली में मुक्तिबोध की मृत्यु हो गयी। अपनी मृत्य से पहले तक मुक्तिबोध अपने निवास स्थान पर रहे जिसे अब मुक्तिबोध स्मारक बना दिया गया है ।
