पुरानी बात हैं | बिहार प्रदेश के चम्पारण में केशरिया थाना के अंतर्गत एक गांव हैं ढेकहा | वहाँ गण्डक नदी के किनारे कर्ताराम बाबा और धवलराम बाबा का मंदिर है | मंदिर के अंदर कुछ ढाई -तीन बीघा जमीन थी | उसी भूमि की फसल से अतिथियों का स्वागत होता था | तथा मूँज की रस्सियाँ बनाकर हाट बाजार में बेचकर मंदिर के दीपक आदि का प्रबंध बाबा लोग किया करते थे |
अगहन का महीना था , दोनों बाबा मंदिर के अंदर सोये हुए थे | मंदिर की भूमि में कुछ धान पका हुआ था | बाबा लोगो का विचार उस फसल को काटने का था | उसी रात को करीब पन्द्रह - बीस चोरों ने बाबा के धान काट उनके गटठर बाँध लिये | जब उन लोगों ने धान के गट्ठरों को उठाकर सिर पर रखा | और वहाँ से जाने का विचार किया , तब उनको मार्ग ही नहीं दिखाई दिया | वे खेत में ही अंधे हो गये |
समूची रात वे जाड़े से काँपते हुए उसी खेत में भटकते रहे | रात के चौथे पहर में बाबा कर्ताराम जागे और जागते ही उन्होंने भोजन की व्यवस्था की और धवलराम बाबा को जागकर उन चोरों के लिए खाने की सामग्री भेजी |
धवलराम बाबा के खेत में पहुंचते ही सब चोर लज्जित हो गये | बाबा तो क्षमा मूर्ति थे ही , उन्होंने उन चोरो को सान्त्वना दी ,खाने को अन्न दिया और साथ ही धान के बोझो में से उनको उनकी कटाई के रूप में उचित पारिश्रमिक भी दिया | उन चोरो का उसी दिन चोरी का पेशा छूट गया |
