विषाद्प्यमृतं ग्राम्हाममेध्यादपि कांचनम |
निचादप्युत्तमां विद्यां स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ||
आचार्य चाणक्य यहां साध्य की महत्ता दर्शाते हुए साधन को गौण मानते हुए कहते हैं कि विष में भी अमृत तथा गन्दगी में से सोना ले लेना चाहिए | नीच व्यक्ति से भी उत्तम विद्या ले लेना चाहिए और दुष्ट कुल से भी स्त्री-रत्न को ले लेना चाहिए |
अमृत अमृत है, जीवनदायी है अत: विष में पड़े हुए अमृत को ले लेना ही उचित होता है | सोना यदि कही पर गन्दगी में भी पड़ा है तो उसे उठा लेना चाहिए | अच्छा ज्ञान या विद्या किसी नीच कुलवाले व्यक्ति से भी मिले तो उसे खुशी से ग्रहण कर लेना चाहिए | इसी तरह यदि दुष्टों के कुल में भी कोई गुणवान, सुशील श्रेष्ट कन्या हो, उसे स्वीकार कर लेना चाहिए|
कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को अमृत, स्वर्ण, विद्या तथा गुण और स्त्री-रत्न को ग्रहण करने से कभी भी हिचकिचाना नहीं चाहिए | वह इनके ग्रहण में गुण को महत्ता दे ,स्रोत को नहीं अर्थात् बुरे स्रोत से कोई उत्तम पदार्थ प्राप्त हो तो उसे प्राप्त करने में व्यक्ति को संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि उपलक्ष्य तो साध्य है साधन नहीं | चाणक्य ने एक स्थान पर यह भी कहा है कि नीच कुल की सुंदर कन्या से विवाह आदि नहीं करना चाहिए, परन्तु यहां उनका संकेत इस ओर है कि भले ही कन्या छोटे कुल में उन्पन्न हुई हो, पर वह गुणवती हो तो उसे ग्रहण करने में चाणक्य कोई आपत्ति नहीं समझते | यहां उन्होंने उसके गुणों की ओर संकेत किया है केवल केवल मात्र रसिक की भांति उसके रूप की ओर नहीं | विवाह के सम्बन्ध में तो चाणक्य की यह स्पस्ट धारणा है कि वह तो समान स्तर के परिवार में ही होना चाहिए | एसा प्रतीत होता है कि चाणक्य विवाह के बाद होने वाले परिणामों से पूर्णतया परिचित थे | जैसा कि आज हम देखते हैं कि समान स्तर और समान विचारवाले परिवारों में विवाह न होने के कारण व्यक्ति को अनेक संकटों से गुजरना पड़ता है किन्तु इसके बाद भी गुण का महत्त्व सर्वोपरि है उसे परखने में भूल नहीं करनी चाहिए |
