शिक्षाप्रद कहानी: जीत का पश्चाताप | The Voice TV

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"जिन्दगी के लक्ष्य में प्राप्ती करते समय सिर्फ 2 सोच रखनी चाहिए, अगर रास्ता मिल गया तो ठीक, नहीं तो रास्ता में खुद बना लूँगा।"

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शिक्षाप्रद कहानी: जीत का पश्चाताप

Date : 28-Oct-2023

 दौड़ शुरू होने वाली थी | सभी खिलाडी अभ्यास कर रहे थे | अपने शरीर को झुकाकर-उछालकर गरमा रहे थे | शरीर के गर्म होने से वे तेज दौड़ पाएंगे | उनकी नसों में खिचावं पैदा नहीं होगा | उनमें लगातार ताकत बनी रहेगी | सभी को अपनी-अपनी जीत पर भरोसा था, परन्तु देखने वालों की नजरें अजीत सिंह पर थीं | अजीत सिंह बहुत अच्छा धावक था | वह दौड़ते हुए हवा से बातें करता था | देखते-ही-देखते अन्य धावकों को पीछे छोड़ जाता था | अनेक बार उसने विजय प्राप्त की थी |

रेफरी ने सीटी बजाई | सभी धावक अपनी-अपनी पंक्ति में आकर खड़े हो गए | उन्हें चक्कर लगाने थे | नकली पिस्तौल दागकर दौड़ आरम्भ की गई | सभी धावक सिर नीचे किए हुए, आगे की ओर झुकाव लेते हुए दौड़ पड़े | दर्शकों में चहल-पहल हुई | सभी उठकर अपने-अपने धावक का नाम ले-लेकर चिल्लाने लगे | धावक ज्योंही उनके पास से निकलते, वे हाथ उठाकर चिल्ला उठते |

यह अंतिम चक्कर था | अजीत सिंह और बंसी साथ-साथ दौड़ रहे थे | दर्शकों में जोश बढ़ता जा रहा था | समापन-रेखा से दस मीटर पहले अजीत सिंह ने पूरा जोर लगाया | वह बंसी से दो कदम आगे निकल गया | साथ दौड़ते बंसी ने जब यह देखा तो उसने आगे निकलते हुए अजीत सिंह का कच्छा पकड़कर पीछे खींचा और स्वयं आगे निकाल गया | किसी को पता चल सका | अजीत सिंह एक सेकंड से पिछड़ गया | बंसी को विजेता घोषित कर दिया गया | अजीत सिंह चाहता तो वह भी बंसी को पकड़ सकता था, किन्तु उसने ऐसा नहीं किया | उसने रेफरी को भी यह बात नहीं बताई और अपने वस्त्र पहनकर घर चला गया |

बंसी को दर्शकों ने उठा लिया | उसे बधाइयां-ही- बधाइयां दी गईं| वह प्रसन्न तो था, पर उसके चेहरे पर प्रसन्नता खुलकर नहीं रही थी | वह जनता था कि ये बधाइयां अजीत सिंह को मिलनी चाहिए थीं | बंसी को सोने का पदक मिला और अजीत सिंह को चांदी का | अस्वस्थ होने की सुचना भेजकर अजीत सिंह पदक लेने नहीं गया | तालियों की गड़गड़ाहट बंसी के कानों में चुभ रही थी | उसे अपने किए का दुःख हो रहा था | सोने का पदक लेकर वह अन्य खिलाड़ियों के साथ अपने घर लौट आया |

घर पहुंचकर भी उसकी आंखों के सामने से अजीत सिंह का चेहरा नहीं हटता था | सोने का पदक उसे अच्छा नहीं लग रहा था | उसे बार - बार महसूस होता – ‘वह एक अच्छा खिलाडी नहीं है | उसमें खेल भावना नहीं है | वह स्वार्थी है |’

सारी रात वह सो नहीं सका | वह अपने आपको बुरा-भला कहता रहा | सुबह के चार बजे होंगे, वह सोने के पदक को लेकर अजीत सिंह के घर की ओर चल दिया | लगभग पांच बजे वह अजीत सिंह के घर पहुंचा | अजीत सिंह अभ्यास  के लिए जा रहा था | बंसी उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला – ‘अजीत सिंह, मुझे क्षमा कर दो, मैंने तुम्हारे साथ धोखा किया है |’

उसने सोने का पदक अजीत सिंह के गले में डालकर कहा –‘इस सोने के पदक के असली हकदार तुम हो, मैं नहीं |’

अजीत सिंह ने अपने गले से सोने का पदक निकाला और बंसी के गले में डालते हुए बोला –‘बंसी एक सच्चे खिलाड़ी के लिए सोने के पदक से ज्यादा जरूरी खेल भावना है | हम खेलते हुए पदक ही प्राप्त नहीं करते, बल्कि खेल भावना भी पैदा करते हैं | खेल हमें यही सिखाते हैं | यह पदक तुम अपने पास ही रखो | जब-जब तुम इसे देखोगे यह तुन्हें खेल भावना याद दिलाएगा |’

सुनकर बंसी की आंखो में पश्चाताप के आंसू गए |


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