आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को चन्द्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर आकाश से अमृत की वर्षा करती है तथा इस रात माता लक्ष्मी श्रीहरि की साथ पृथ्वीलोक पर भ्रमण करने आती हैं और इस पूर्णिमा को हम शरद पूर्णिमा कहते है | पुराणों के अनुसार माता लक्ष्मी इसी पूर्णिमा तिथि को समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई थी | इसलिए हिन्दू धर्म में इस का रात विशेष महत्व होता है |
शरद पूर्णिमा की एक प्रचलित कथा है –
एक गांव में एक साहूकार हुआ करता था उनकी दो सुन्दर कन्यायें थी | परंतु साहूकार की दोनों बेटियों में से बड़ी बेटी धार्मिक रीति-रिवाज में आगे थी और वही दूसरी तरफ छोटी बेटी का नाम इन सब कामो में मन नहीं हुआ करता था |बड़ी बहन सभी धार्मिक रीति-रिवाज मन लगाकर किया करती थी ,दूसरी बहन बे मन से किया करती थी | और दोनों बहन का विवाह भी हो चूका था दोनों ही शरद पूर्णिमा का व्रत किया करती थी | लेकिन छोटी बहन के धार्मिक कार्य अधूरे होने के कारण उसके जितने भी संतान जन्म लेते उनकी मृत्यु हो जाती थी | वह दुखी होकर एक ब्राम्हण के पास इसका कारण पूछा ,तो ब्राम्हण ने कहा कि तुम हमेशा पूजा-पाठ आधे मन से करती हो इस लिए तुम्हारे संतान जन्म लेते ही उनकी मृत्यु हो जाती है ,तब साहूकार की छोटी बेटी ने इसका उपाय पूछा तब ब्राम्हण के उसको शरद पूर्णिमा का व्रत का बताया ब्राम्हण के बात सुन साहूकार की बेटी ने पूरे श्रद्दा पूर्वक शरद पूणिमा की व्रत संपन्न किया लेकिन उसके पश्चात भी उसका पुत्र जीवित नहीं रहा | उसने अपने मरे हुए बच्चे को एक चौकी पर लेटा दिया और उसके ऊपर एक कपड़े को ढक दिया और अपनी बड़ी बहन को अपनी घर बुलाया और उस चौकी में बैठने को कहती है | जब बड़ी बहन उस चौकी में बैठने गई उसकी स्पर्श के ही बच्चा रोने लगा | बड़ी बहन यह देख चौक है और उसने कहा यह तो तुम्हारा बेटा है यह मर जाता तो मुझे दोष लगता | तब छोटी बहन के कहा कि यह तो पहले से हे मारा हुआ था तुम्हारे स्पर्श से जीवित हुआ है | तुम्हारे पुण्यों के कारण तुम्हारे स्पर्श से ही उसके प्राण वापस आये है | यह चमत्कार देख लोगो ने शरद पूर्णिमा का व्रत प्रारंभ कर दिए |
शरद पूर्णिमा का महत्व -
यह व्रत मनोकामना पूरा करता है | इसे कोजागरी व्रत एवं रास पूर्णिमा भी कहा जाता है | चंद्रमा के प्रकाश को मुकुंद भी कहा जाता है |इसलिए इसे कौमुदी व्रत की उपाधि भी दी गई है इस दिन भगवान कृष्ण ने गोपियों संग रास लीला रची थी जिसे महा रास भी कहा जाता है |
मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के दिन रात 12 बजे चंद्रमा से अमृत गिरता है और चंद्रमा के इस आशीर्वाद को पाने के लिए खीर अथवा मेवे वाला दूध बनाकर घर के छत पर रखा जाता है | तथा रात के 12 बजे चंद्रमा की पूजा कर के उस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है |
