सरिता सागर की छोटी बहन थी | वह बहुत जिद्दी थी | अभी केवल पांच साल की थी | शरारत करने में वह सबसे आगे थी |
काम बिगाड़ेगी तो माँ का, पैसे लेकर खर्च करेगी तो पापा से, लड़ाई करेगी तो सागर से | उसे मारेगी और फिर स्वयं रोने भी लगेगी | माँ को भी उसकी बात माननी पड़ती थी |
बेचारे सागर को डांट खानी पड़ती थी | माँ को चिंता लगी रहती थी कि बड़ी होने पर वह भाई को भाई नहीं समझेगी उससे घृणा करेगी | कैसी अजीब लड़की है यह |
एक दिन सागर को बुखार आ गया | अगले दिन पेट दर्द हुआ और उल्टियां होने लगीं | उसे तीन दिन के बाद अस्पताल ले जाना पड़ा | उसके शरीर में पानी की कमी हो गई थी | चार दिन तक वह अस्पताल में रहा | इस एक सप्ताह ने सरिता को पूरी तरह बदल दिया | वह बार-बार भैया को पूछती | वह हर समय उदास रहती | शरारतें तो मानो वह भूल ही गई थी |
वह भगवन से कहती – ‘भगवान, मेरे भैया को ठीक कर दो ना | मैं आपको महंगी टाँफी दूंगी | अपनी नई साइकिल भी दे दूँगी |’
एक दिन माँ अस्पताल से लौटी | वह माँ से लिपटकर रोने लगी – “ मैं भैया के पास जाऊंगी, मुझे भैया के पास ले चलो |’’
माँ की आंखों में आंसू आ गए | माँ कहने लगी – “भैया बीमार है | अस्पताल में तुम उससे लड़ोगी |’’
सरिता ने माँ की बात काटते हुए कहा – “नहीं माँ, मैं अब भैया से नहीं लडूंगी | मुझे भैया के पास ले चलो |’’
वह रोए जा रही थी और कहे जा रही थी | माँ ने उसे गले से लगा लिया | उसके बाद उसके आंसू पोछें और मन-ही-मन सोचने लगी – “इन दोनों भाई-बहन की लड़ाई में भी कितना प्यार है |’’
