महाभारत युद्ध के अन्तिम दिन श्री कृष्ण सभी पांडवो को लेकर उस शिविर मे चले गये,जहा युद्ध के दिनो मे पांडवो की रानिया निवास कर रही थी |
द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा को इसकी सूचना मिल गयी और इसको बदल लेने क उपयुक्त अवसर जानकर उसने पांडवो के शिविर में आग लगा दी | उस शिविर में जितने भी पांडव तथा सैनिक बचे हुए थे | वे सबके सब भस्म हो गये | उन भस्म होने वालो में द्रोपति के पुत्र भी थे |
प्रात : काल जब इस दुष्कृत्य की सूचना मिली और शिविर की दशा देखी तो सबके दिल दहल गये | पाण्डव महिलाए करुण क्रन्दन करने लगी | महारानी द्रोपती की व्यथा का तो पार ही नही था | छानबीन करने पर पता चला कि इस दुष्कृत का कर्त्ता अश्वत्थामा हैं |
अर्जुन ने द्रोपती को सान्त्वना देते हुए कहा -'' मैं हत्यारे अश्वत्थामा को इसका दण्ड दूंगा | उसका कटा हुआ मस्तक देखकर तुम अपना शोक दूर करना |''
अर्जुन अश्वत्थामा को खोजने लगे और जब वह सामने दिखाई दिया तो उसे पकडने के लिये वे लपके ही थे कि उसके अपना ब्रह्मास्त्र चला दिया |किन्तु वह निष्फल सिद्ध हुआ |आखिर में वह पकड़ा गया | न जाने क़्यो अर्जुन ने उसका मस्तक छिन्न नही किया | अर्जुन उसे बांधकर द्रोपदी के सम्मुख ले आये |
अश्वत्थामा को देखने ही भीम ने दांत पीसते हुए कहा-‘’ इस दुष्ट का मस्तक छिन्न क़्यो नही किया | यह अभी तक जीवित क़्यो है ?’’
किन्तु उस समय द्रोपती की दशा कुछ और ही थी | दु :शासन के रक्त से अपने बालो को सीचनेवाली रणचण्डी द्रोपती इस समय दया की मूर्ति बन गयी थी |पुत्रो के शव इस समय उसके सम्मुख पडे हुए थे | हत्यारा सामने खडा हुआ | पशु के सामन बन्धे हुये और लज्जा से मुख नीचे किये हुये अश्वत्थामा को देख कर द्रोपती के मुख से निकल गया – ‘’हाय, हाय ! यह आप लोगो ने क्या किया ? जिनकी कृपा से आप लोगो ने शस्त्रज्ञान पाया हैं वे गुरु द्रोणाचार्य ही यहाँ पुत्र रूप में खड़े हैं |’’
‘’पुत्र शोक कैसा होता हैं ,यह मैं अनुभब कर रही हूँ | इनकी पूजनीया माताजी को यह शोक न हो, वे मेरे समान रुदन न करे , इसलिए इन्हें तुरंत मुक्त कर दीजिए | ‘’ पांडवो के लिए और कुछ करने को नहीं रह गया था | उन्होंने अश्वत्थामा को बंधनमुक्त करते हुए उसके मस्तक की मणि ले ली | अश्वत्थामा लज्जित सा वहाँ से अपने शिविर की ओर चला गया |
