यह प्रसिद्ध है की कर्ण अपने समय में विश्व में सर्वश्रेष्ठ दानी समझ जाता था | उधर अर्जुन को भी अपनी दानशीलता पर बड़ा गर्व था | एक बार भगवन श्रीकृष्ण ने अर्जुन के समक्ष कर्ण की उदारता एवं याचक मात्र को बिना दान दिये वापस न करने की मुक्त कंठ से प्रशंसा की | अर्जुन उस प्रशंसा को सह नहीं सका और उसके कहा माधव आप बार बार कर्ण की प्रशंसा कर हमारे हृदय को ठेस पहुंचा रहे हैं | मैं समझता हूँ | कि आपको मेरी दानशीलता का ज्ञान ही नहीं हैं | अन्यथा मेरे सामने ही आप इस तरह की बात बार - बार न करते |
भगवन चुप रहे |
आखिर एक दिन इसकी परीक्षा का दिन आ ही गया | एक दिन एक ब्राम्हण अर्जुन के द्वार पर पहुंचा और कहने लगा धनजय सुना है आपके द्वार से कोई भी याचक लौट कर नहीं जाता | मैं आज बड़े ही धर्म संकट में पड़ गया हूँ | मेरी पत्नि का सहसा देहांत हो गया मरते समय उसने मुझसे प्रार्थना की कि उसका दाह संस्कार केवल चंदन की लकड़ी की चिता पर ही करने की कृपा की जाए | मैं ठहरा निर्धन ब्राम्हण इतनी व्यवस्था करना मेरे वश की बात नहीं हैं | क्या आप यह व्यवस्था कर सकते हैं | अभी इसका प्रबंध करते है |
अर्जुन ने भंड़ारी को बुलाकर आज्ञा दी कि वह पच्चीस मत चन्दन का काष्ठ तोलकर ब्राम्हण महोदय के घर पर पहुंचाने की व्यवस्था करे दुर्भाग्य से उस दिन न तो भंडार में चंदन का काष्ठ विद्यामान था | और न बाजार में ही उपलब्ध था | अंत में विवश होकर भंडारी अर्जुन के पास आकर कहने लगा महाराज आज तो चंदन की लकड़ी का प्रबध कर पाना सवर्था असंभव हैं | यह सुनकर ब्राम्हण अर्जुन से कहने लगा तो क्या मुझे किसी अन्य स्थान पर जाना होगा |
अर्जुन ने कहा '' महाराज अब तो लाचारी हैं |''
वह ब्राम्हण अर्जुन के घर से चलकर सीधे कर्ण के द्वार पर पहुंचा | उसने कर्ण से भी उसी प्रकार चंदन की लकड़ी की याचना की |कर्ण ने अपने भंडारी को आज्ञा दी | भंडारी ने भंडार घर में लकड़ी न देख कर बाजार में छानबीन की वहाँ भी उसको चंदन की लकड़ी नहीं मिली तो निराश लौटकर उसके कर्ण को स्थिति से अवगत करा दिया | ब्राम्हण सब देख सुन रहा था |
स्थिति समझकर ब्राम्हण बोला -'' महाराज | तो अब मैं चँलू |
कर्ण बोले -'' महाराज आप तनिक रुकिये , मैं आपकी व्यवस्था करता हूँ |
उन्होंने भृत्यो को आदेश दिया कि जितना काष्ट इनको चाहिए ,उतना काष्ट हमारे भवन में लगे चंदन के खम्भों को उखाड़ कर इनके लिए उपलब्ध कराया जाए | इस प्रकार ब्राम्हण की मांग कर्ण ने पूरी कर दी |
ब्राम्हण ने पत्नि का दाह संस्कार किया | शाम को श्रीकृष्ण तथा अर्जुन भ्रमण के लिए निकले | देखो तो एक ब्राम्हण श्मशान पर संकीर्तन कर रहा है | उससे इसका कारण पूछा तो उसने कहा बस बार - बार धन्यबाद है उस कर्ण को जिसने आज मेरे संकट को दूर करने के लिए अपने दान की मनोवृत्ति की रक्षा करते हुए अपने महल के चंदन के खम्भों को गिवारकर सोने जैसे महल को ढहा दिया | भगवान उसका भला करे |
अब श्रीकृष्ण ने अर्जुन की और देखो और कहा भाई चंदन के खभे तो तुम्हारे महल में भी थे | पर तुम्हे उनकी याद ही नहीं आयी | यह देख और सुनकर अर्जुन बड़ा लज्जित हुआ |
