पंचतंत्र अध्याय 1- मित्रभेद | The Voice TV

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"जिन्दगी के लक्ष्य में प्राप्ती करते समय सिर्फ 2 सोच रखनी चाहिए, अगर रास्ता मिल गया तो ठीक, नहीं तो रास्ता में खुद बना लूँगा।"

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पंचतंत्र अध्याय 1- मित्रभेद

Date : 05-Oct-2023

 बहुत समय पहले की बात है दक्षिण राज्य के महिलारोप्य नामक नगर में वर्धमान नामक एक वैश्य व्यापारी रहा करता था। उसने उचित ढंग से व्यापर करके बहुत सारे  धन एकत्र कर लिया था।,फिर  भी उसे धन कमाने और संग्रह करने की इच्छा पूर्ण  हो रही थी। वह एक दिन सोने का प्रयास करता रहा ,करवटें बदलता सोचने लगा कि धन इस संसार में सबसे पूजनीय वस्तु है। धनवान व्यक्ति से सब मित्रता करते है। संसार के सभी चीजें धन से प्राप्त की जा सकती हैं। धन से ही मित्र बनाये जा सकते हैं। निर्धनता कष्ट प्रद होती हैं।  निर्धन व्यक्ति के अपने भी पराये हो जाते है।  धन कमाने के अनेक उपायों में व्यापार को श्रेष्ठ बताया गया है। 

ऐसे विचार कर के वर्धमान सेठ ने नगर से बाहर जाकर व्यापर करके और अधिक धन कमाने की बात सोची।  उसने बेचने लायक चीजें एकत्र कर दूसरे नगर हेतु व्यापर करने जाने की पूरी तैयारी कर ली।  उसने अपने बैल गाड़ी पर अपने प्रिय हिष्ट-पुष्ट संजीवक बैल को जोता और लंबे सफर पर रवाना हो गया।

सफर चलता रहा।  एक दिन यमुना नदी के तट से जब वर्धमान की बैलगाड़ी गुजर रही थी तो वहा की दलदल भूमि में उसके संजीवक बैल के पैर धस गये। सेठ और उसके नौकर-चाकरों ने बैल को दलदल से निकालने की भरसक चेष्टा की,पर सफल  हुए। अंत में यह निश्चय किया गया की इस निर्जन वन के निकटवर्ती क्षेत्र में रात गुजारना किसी भी तरह अक्लमंदी नहीं।  कही शहर में चलकर रात गुजारना हितकर है।  यही विचार कर वर्धमान सेठ ने संजीवक की देख-रेख हेतु एक नौकर को छोड़ा तथा अन्य नौकरों की सहायता से बैलगाड़ी तथा उस पर लदा व्यापार सामान लेकर आगे बढ़ गया। संजीवक की देख रेख हेतु छोड़े गये नौकरों को हिदायत की कि संजीवक जब दलदल से निकल आये तो उसे लेकर शहर  जाए।

वर्धमान सेठ के पीछे नौकर को घने निर्जन इलाके का सन्नाटा डर पैदा करने लगावह संजीवक को छोड़ भाग खड़ा हुआ। अगले दिन सेठ से मिल कर कह दिया की संजीवक दलदल में फस कर मर गया।

वर्धमान सेठ अपने प्रिय बैल की मृत्यु का समाचार दुःख में भर उठा। पर सोचा होनी को कौन टाल सकता है।  वह व्यापार हेतु नया बैल खरीद ,गाड़ी में जोत कर आगे बढ़ गया। 

दूसरी ओर ,

संजीवक कुछ देर सुस्ताने के बाद नये सिरे से दलदल से निकलने के लिए जोर लगाने लगा। उसे अपने प्रयास में सफलता मिल गयी।

यमुना के तट पर हरीहरी घास उगी हुई थी। संजीवक मजे से घास चरने और मौज की जिंदगी गुजरने लगा। अब  तो उसे श्रम करना पड़ता था , ही बंधन में रहना पड़ता था। आजादी से मनचाहा भोजन चरकर वह पहले से भी ज्यादा हिष्ट-पुष्ट होने लगा। पूर्णतः हष्ट -पुष्ट होने पर वह वन में अकेले जब इच्छा होती ,चिंघाड़ने लगता।  उसके सींग भी खूब  पैन  गये थे।  छोटे जानवर उस पहाड़ से जानवर को देख कर यु भी भाग खड़े होते। 

एक दिन वन में राजा पिंगलक शेर अपने अनुयायियों के साथ यमुना तट पर प्यास बुझाने पहुँचा तो उसने संजीवक की भीषण दहाड़ सुनी।  उसने अपने अनुयायियों से पूछा तो उन्होंने पहाड़ से डील डौल वाले जानवर की बढ़ा -चढ़ाकर प्रसंशा की।  पिंगलक डर गया। तट पर जाकर पानी पिने की इच्छा को त्याग कर वह निकट ही अपने अनुचरो ,मंत्रियो,सैनिकों,गुप्तचरों,समरशको घर में बैठ कर विचार करने लगा कि वह क्या करें।

वैसे समय तो पिंगलक सिंह के पीछे पीछे कटरक और दमनक दो सियार लगे रहते थे। पिंगलक ने उन दोनों को किसी बात से रुष्ट होकर अपनी सेवा से हटा दिया था।  पदच्युत करकट और दमनक फिर भी अपने राजा के पीछे पीछे यह सोच कर लगे रहते थे कि संभव है राजा की भी उनकी सेवा की आवश्यकता पड़ जाए और उन्हें पूर्व वाला पद बहाल कर दें।  अपने स्वामी पिंगलक को बिना प्यास बुझाए उदास बैठ जाता देखकर करकट और दमनक दोनों परामर्श करने लगे।

दमनक ने करकट से पूछा -

"मित्र करकट !हमारे स्वामी अपने दल के साथ बरगद वृक्ष के नीचे उदास मुद्रा में क्यों बैठे हैं?"

भाई हमे इन बातो से क्या... ?" करकट  ने प्रत्युत्तर में कहा-

"तुम्हें मालूम होना चाहिए कि जो कार्य के कुछ करने की इच्छा रखता है ,वह कील निकलने वाले बन्दर की तरह नष्ट हो जाता है।

"इस संबंध में व्यर्थ में कील उखाड़ने के चेष्ठ करने वाले मुर्ख बन्दर की तरह कथा सुनो - कथा सुन कर तुम्हें ज्ञात हो जाएगा कि किसी के मामले में व्यर्थ टांग अड़ाने से क्या होता है।

 

ऐसे बात है तो मुर्ख बन्दर के कथा जरूर सुनाओ..... " दमनक ने कहा करकट  ने दमनक को मुर्ख बन्दर कि जो कथा सुनायी,वह इस प्रकार है-…………


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