आचार्य विष्णुगुप्त (चाणकय) द्वारा प्रणीत चाणक्य नीति का मुख्य विषय मानव मात्र को जीवन के प्रत्येक पहलू की व्यावहारिक शिक्षा देना है | इसमें मुख्य रूप से धर्म, संस्कृति, न्याय, शांति, सुशिक्षा एवं सर्वतोन्मुखी मानव-जीवन की प्रगति की झाकियां प्रस्तुत की गई हैं | आचार्य चाणक्य की नीतिपरक इस महत्वपूर्ण ग्रंथ में जीवन-सिद्धांत और जीवन-व्यव्हार तथा आदर्श और यथार्थ का बड़ा सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है | जीवन की रीति-नीति सम्बन्धी बातों का जैसा अद्भुत और व्यावहारिक चित्रण यहाँ मिलता है | इनमें से एक नीति हम यहाँ प्रेसित करते हैं |
अच्छा मनुष्य कौन
अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तम:|
धर्मोपदेशविश्यातं कार्या·कार्याशुभाशुभम् ||
धर्म का उपदेश देनेवाले, कार्य-अकार्य, शुभ-अशुभ को बतानेवाले इस नीतिशास्त्र को पढ़कर जो सही रूप में इसे जनता है,वही श्रेष्ठ मनुष्य है |
इस नीतिशास्त्र में धर्म की व्याख्या करते हुए क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, क्या अच्छा हैं, क्या बुरा है इत्यादि ज्ञान का वर्णन किया गया है | इसका अध्ययन करके इसे अपने जीवन में उतारनेवाला मनुष्य ही श्रेष्ठ मनुष्य है | आचार्य विष्णुगुप्त ( चाणक्य ) का यहाँ कहना है कि ज्ञानी व्यक्ति नीतिशास्त्र को पढ़कर जान लेता है कि उसके लिए करणीय क्या है और न करने योग्य क्या है | साथ ही उसे कर्म के भले-बुरे के बारे में भी ज्ञान हो जाता है| कर्तव्य के प्रति व्यक्ति द्वारा ज्ञान से अर्जित यह दृष्टी ही धर्मोपदेश का मुख्य सरोकार और प्रयोजन है | कार्य के प्रति व्यक्ति का धर्म ही व्यक्ति-धर्म ( मानव-धर्म ) कहलाता है अर्थात् मनुष्य अथवा किसी वस्तु का गुण और स्वभाव जैसे अग्नि का धर्म जलाना और पानी का धर्म बुझाना है उसी प्रकार राजनीति में भी कुछ कर्म धर्मानुकूल होते हैं बहुत कुछ धर्म के विरुद्ध होते हैं |
गीता में कृष्ण ने युद्ध में अर्जुन को क्षत्रिय का धर्म इसी अर्थ में बताया था कि रणभूमि में सम्मुख शत्रु को सामने पाकर युद्ध ही क्षत्रिय का एकमात्र धर्म होता है | युद्ध से पलायन या विमुख होना कायरता कहलाती है| इसी अर्थ में आचार्य चाणक्य धर्म को ज्ञानसम्मत मानते है |
