प्रेरक प्रसंग अध्याय 1- ज्ञान का पहला पाठ | The Voice TV

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"जिन्दगी के लक्ष्य में प्राप्ती करते समय सिर्फ 2 सोच रखनी चाहिए, अगर रास्ता मिल गया तो ठीक, नहीं तो रास्ता में खुद बना लूँगा।"

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प्रेरक प्रसंग अध्याय 1- ज्ञान का पहला पाठ

Date : 03-Oct-2023

 एक युवा ब्रम्हाचारी देश-विदेश का भ्रमण कर और वहाँ के ग्रन्थों का अध्ययन कर जब अपने देश लौटा,  तो सबके पास इस बात की शेखी बघारने लगा कि उसके समान अधिक ज्ञानी-विद्वान और कोई नहीं | उसके पास जो भी व्यक्ति जाता, वह उससे प्रश्न किया जाता कि क्या उसने उससे बढ़कर कोई विद्वान देखा है ?

बात भगवान् बुद्ध के कानो में भी जा पहुँची | वे ब्राम्हण-वेश में उसके  पास गए | ब्रम्हाचारी ने उनसे प्रश्न किया, ‘’तुम कौन हो, ब्राम्हण ?

‘’अपनी देह और मन पर जिसका पूर्ण अधिकार है, मै ऐसा एक तुक्छ मनुष्य हूँ|’’ – बुद्धदेव ने जवाब दिया |

‘’भलीभाँति स्पष्ट करो, ब्राम्हण ! मेरे तो कुछ भी समझ में न आया |’’- वह अहंकारी बोला |

बुद्धदेव बोले, ‘’जिस तरह कुम्हार घड़े बनता है, नाविक नौकायें चलता है, धनुर्धारी बाण चलता है, गायक गीत गता है, वादक वाद्य बजता है और विद्वान वाद-विवाद में भाग लेता है, उसी तरह ज्ञानी पुरुष स्वयं पर ही शासन करता है |’’

‘’ज्ञानी पुरुष भला स्वयं  पर कैसे शासन करता है ?’’ – ब्रम्हाचारी ने पुन: प्रश्न किया |

‘’लोगों द्वारा स्तुति-सुमनों की वर्षा किये जाने पर अथवा निंदा के अंगार बरसाने पर भी ज्ञानी पुरुष का मन शांत ही रहता है | उसका मन सदाचार, दया और विश्व-प्रेम पर ही केन्द्रित रहता है, अतः प्रशंसा या निंदा का उस पर कोई भी असर नहीं पड़ता | यही वजह है कि उसके चित्तसागर में शांति की धारा बहती रहती है |

उस ब्रह्मचारी ने जब स्वयं के बारे में सोचा , तो उसे आत्मग्लानी हुई और बुद्धदेव के चरणों पर गिरकर बोला,’’स्वामी, अब तक मैं भूल में था | मैं स्वयं को ही ज्ञानी समझता था, किन्तु आज मैंने जाना कि मुझे आपसे बहुत कुछ सीखना है |’’

‘’हाँ, ज्ञान का प्रश्न पाठ ही आज तुम्हारी समझ में आया है, बंधु ! और वह है नम्रता | तुम मेरे साथ आश्रम में चलो  और इसके आगे के पाठों का अध्ययन वहीं करना |’’   

 

 

 

 

 


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